अदम्य साहस, शौर्य और कौशल के प्रतीक सपूत को श्रद्धांजलि
राज बहादुर सिंह
कैबिनेट की मीटिंग चल रही थी। अचानक पीएम ने इशारा किया। दरवाजा खुला और एक रोबीले शख्स ने भीतर कदम रखा और इशारा पाकर बैठ गया। पीएम ने पूछा क्या हम हमला करने के लिए तैयार हैं। रोबीले शख्स ने माहौल का सरसरी तौर पर जायजा लिया और सपाट लहजे में कहा 'नो'। और फिर मौसम से लेकर आर्मी की तैयारी और कुछ रणनीतिक बातें कहीं। पीएम ने कैबिनेट मीटिंग खत्म करने का और उस शख्स को रुकने का इशारा किया।
मंत्रियों के बाहर जाते ही उस शख्स ने खड़े होकर कहा '' मैडम प्राइम मिनिस्टेट, आई आफर टू रिजाइन''। पीएम ने कहा '' नो''. और पूछा क्या करना चाहिए। उस शख्स ने कहा मुझे ऑपरेशन्स की आज़ादी चाहिए। क्या करना है कैसे करना है इस मे कोई दखल नहीं होना चाहिए और कब करना है यह भी मैं तय करूंगा। ऐसा होने पर मैं जीत की गारंटी देता हूँ। पीएम ने कुछ क्षण सोचा और कहा '' यू गॉट इट'।
और यूं बनी रूप रेखा और फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ की अगुवाई में भारत ने 1971 में पाकिस्तान को न केवल शिकस्त दी बल्कि बांग्लादेश बनवाकर हमेशा टीस देने वाला जख्म भी दिया। आज देश के पहले फील्ड मार्शल
, पदम् विभूषण और पदम् भूषण से सम्मानित सैम मानेकशॉ की पुण्य तिथि है। आइए एक नजर डालते हैं भारत मां के इस अमर सपूत पर और जाने कि क्यों यह शख्स अलग था, विलक्षण था और क्यूं नमन योग्य है।
आप चौंक सकते हैं यह जान कर कि मानेकशॉ के ऊपर देशद्रोह का केस चलाया गया जब नेहरु पीएम थे और उनके मुंह लगे वीके कृष्ण मेनन रक्षा मंत्री थे। मानेकशॉ थोड़े मुंहफट थे और उन्होंने कहीं कथित टिप्पणीं की कि सेना में पोलिटिकल लीडरशिप का दखल बहुधा अनावश्यक होता है। कृष्ण मेनन ने एक बार उनसे पूछा कि तत्कालीन आर्मी चीफ केएस थिमैया के बारे में उनकी क्या राय है। मानेकशॉ ने कहा कि मैं अपने चीफ के बारे में कोई राय आपको नहीं दूंगा क्योंकि फिर आप मेरे मातहत अफसरों से यही सवाल मेरे बारे में करेंगे।
जाहिर था कि नकचढ़े मेनन इससे चिढ़ गए और देशद्रोह का केस इसी पृष्ठभूमि से निकला हालांकि मानेकशॉ इससे बरी हो गए। चीन से लड़ाई के समय भी उन्होंने अपनी मतभिन्नता पीएम नेहरू और उनके प्रिय मेनन से प्रकट की और आखिरकार मेनन को चीन से हार के बाद बर्खास्त किया गया।
मानेकशॉ 1969 में आर्मी चीफ बने और 1971 में पाकिस्तान की पराजय के बाद उन्हें फील्ड मार्शल बनाया गया और वह पहले आर्मी ऑफिसर थे जिन्हें यह सम्मान मिला। मानेकशॉ ने सेना में जातिगत आरक्षण का विरोध किया। उन्होंने आर्मी को वॉर मशीनरी में बदलने के लिए उल्लेखनीय प्रयास किए। रिटायर होने के बाद भी वह एक्टिव रहे और तमाम बड़ी कंपनियों के बोर्ड में रहे।
ऐसी ही एक कंपनी के बोर्ड से जब उन्हें सरकार के इशारे पर हटाया गया और उनकी जगह नायक नाम वाले व्यक्ति को बोर्ड में लिया गया तो मानेकशॉ ने दिलचस्प टिप्पणी की - This is the first time when a Nayak (corporal) has replaced a Field Marshal.
मानेकशॉ 1973 में रिटायर हुए लेकिन उनके बकाए भत्ते का भुगतान तीस साल बाद तत्कालीन राष्ट्रपति एपेजी अब्दुल कलाम ने उनके घर जाकर 1.3 करोड़ का चेक देकर किया। मानेकशॉ से जुड़े तमाम प्रेरणादायक किस्से हैं। कुल मिलाकर एक अनोखे व्यक्तित्व और प्रचंड देशभक्त ने 27 जून 2008 को आखिरी सांस ली । शत शत नमन। कुछ यू कहें तो ठीक होगा -
हज़ार बर्क गिरे और लाख आंधियां उठें
वो फूल खिल के रहेंगे जो खिलने वाले हैं
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