Friday, 29 June 2018

प्रधानमंत्री जी आप भारत को विश्व गुरु बना रहे हैं या बेवकूफ बना रहे हैं ?


स्वीस नेशनल बैंक ने अपनी सालाना रिपोर्ट में बताया है कि 2017 में उसके यहां जमा भारतीयों का पैसा 50 प्रतिशत बढ़ गया है। नोटबंदी के एक साल बाद यह कमाल हुआ है। ज़रूरी नहीं कि स्विस बैंक में रखा हर पैसा काला ही हो लेकिन काला धन नहीं होगा, यह क्लिन चिट तो मोदी सरकार ही दे सकती है। मोदी सरकार को यह समझदारी की बात तब नहीं सूझी जब ख़ुद नरेंद्र मोदी अपने ट्विटर हैंडल से ट्विट किया करते थे कि स्विस बैंक में जमा काला धन को वापस लाने के लिए वोट करें। ऑनलाइन वोटिंग की बात करते थे।

सरकार को बताना चाहिए कि यह किसका और कैसा पैसा है? काला धन नहीं है तो क्या लीगल तरीके से भी भारतीय अमीर अपना पैसा अब भारतीय बैंकों में नहीं रख रहे हैं? क्या उनका भरोसा कमज़ोर हो रहा है? 2015 में सरकार ने लोकसभा में एक सख्त कानून पास किया था। जिसके तहत बिना जानकारी के बाहर पैसा रखना मुश्किल बताया गया था। जुर्माना के साथ साथ 6 महीने से लेकर 7 साल के जेल की सज़ा का प्रावधान था। वित्त मंत्री को रिपोर्ट देना चाहिए कि इस कानून के बनने के बाद क्या प्रगति हुई या फिर इस कानून को कागज़ पर बोझ बढ़ाने के लिए बनाया गया था।

इस वक्त दो दो वित्त मंत्री हैं। दोनों में से किसी को भारतीय रुपये के लुढ़कने पर लिखना चाहिए और बताना चाहिए कि 2013 में संसद में जो उन्होंने भाषण दिया था, वही बात कर रहे हैं या उससे अलग बात कर रहे हैं और उनका जवाब मनमोहन सिंह के जवाब से क्यों अलग है। एक डॉलर की कीमत 69 रुपये पार कर गई और इसके 71 रुपये तक जाने की बात हो रही है। जबकि मोदी के आने से 40 रुपये तक ले आने का ख़्वाब दिखाया जा रहा था।

ईरान पर अमरीकी प्रतिबंध को लेकर छप रही ख़बरों पर नज़र रखिए। क्या भारत अपनी ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा करने के लिए स्वतंत्र राह पर चलेगा या अमरीका जिधर हांकेगा उधर जाएगा ? टाइम्स आफ इंडिया की हेडिंग है कि निक्की हेले सख़्त ज़बान में बोल रही हैं कि ईरान से आयात बंद करना पड़ेगा। निक्की हेले संयुक्त राष्ट्र में अमरीकी राजदूत हैं और भारत की यात्रा पर हैं।

अमरीका चाहता है कि भारत ईरान से तेल का आयात शून्य पर लाए। ओबामा के कार्यकाल में जब ईरान पर प्रतिबंध लगा था तब भारत छह महीने के भीतर 20 प्रतिशत आयात कम कर रहा था मगर अब ट्रंप चाहते हैं कि एक ही बार में पूरा बंद कर दिया जाए। 

इंडियन एक्सप्रेस में तेल मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का बयान छपा है। आप इस बयान पर ग़ौर कीजिए जिसका मैंने एक्सप्रेस से लेकर अनुवाद किया है। ऐसा लगता है कि तेल मंत्री ही विदेश मंत्री हैं और इन्होंने ट्रंप को दो टुक जवाब दे दिया है।  अगर ऐसा है तो प्रधानमंत्री या विदेश मंत्री को औपचारिक रूप दे देना चाहिए ताकि जनता को पता चले कि ईरान प्रतिबंध को लेकर भारत की क्या नीति है।

"पिछले दो साल में भारत की स्थिति इतनी मज़बूत हो चुकी है कि कोई भी तेल उत्पादक देश हमारी ज़रूरतों और उम्मीदों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता है। मेरे लिए मेरा हित ही सर्वोपरि है और मैं जहां से चाहूंगा वहीं से भू-राजनीतिक स्थिति और अपनी ज़रूरतों के हिसाब से कच्चा तेल ख़रीदूंगा। हम जहां से चाहेंगे वहां से कच्चा तेल ख़रीदेंगे। "

ये बयान है धर्मेंद्र बयान का। आपको हंसी आनी चाहिए। अगर दो साल में भारत की स्थिति मज़बूत हो गई है तो भारत साफ साफ क्यों नहीं कह देता है।

जबकि इसी एक्सप्रेस में इसी बयान के बगल में एक कालम की खबर लगी है कि तेल रिफाइनरियों को कहा गया है कि वे विकल्प की तलाश शुरू कर दें। उन्हें ये बात तेल मंत्रालय ने ही कही है जिसके मंत्री धर्मेंद्र प्रधान हैं। सूत्रों के हवाले से इस ख़बर में लिखा है कि तैयारी शुरू कर दें क्योंकि हो सकता है कि तेल का आयात बहुत कम किया जाए या फिर एकदम बंद कर दिया जाए।

इसके बरक्स आप मंत्री का बयान देखिए। साफ साफ कहना चाहिए कि जो अमरीका कहेगा हम वही करेंगे और हम वही करते रहे हैं। इसमें 56 ईंच की कोई बात ही नहीं है। आप रुपये की कीमत पर पोलिटिक्स कर लोगों को मूर्ख बना सकते हैं, बना लिया और बना भी लेंगे लेकिन उसका गिरना थोड़े न रोक सकते हैं। वैसे ही ट्रंप को सीधे सीधे मना नहीं कर सकते। ज़रूर भारत ने अमरीका से आयात की जा रही चीज़ों पर शुल्क बढ़ाया है मगर इस सूची में वो मोटरसाइकिल नहीं है जिस पर आयात शुल्क घटाने की सूचना खुद प्रधानमंत्री ने ट्रंप को दी थी। अब आप पोलिटिक्स समझ पा रहे हैं, प्रोपेगैंडा देख पा रहे हैं?

बिजनेस स्टैंडर्ड के पेज छह पर निधि वर्मा की ख़बर छपी है कि भारत ईरान से तेल आयात को शून्य करने के लिए तैयार हो गया है। आप ही बताइये क्या इतनी बड़ी ख़बर भीतर के पेज पर होनी चाहिए थी? इस खबर में लिखा है कि तेल मंत्रालय ने रिफाइनरियों को कहा है कि वैकल्पिक इंतज़ाम शुरू कर दें। यह पहला संकेत है कि भारत सरकार अमरीका की घुड़की पर हरकत करने लगी है।

भारत ने कह चुका है कि वह किसी देश की तरफ से इकतरफा प्रतिबंध को मान्यता नहीं देता है। वह संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंध का ही अनुसरण करता है। लेकिन जब यह कहा है कि तो फिर इस बात को तब क्यों नहीं दोहराया जा रहा है जब निक्की हेली दिल्ली आकर साफ साफ कह रही हैं कि ईरान से आयात को शून्य करना पड़ेगा।

हिन्दी अखबारों में ये सब जानकारी नहीं मिलेगी। मेहनत से आप तक लाता हूं ताकि आप इन्हें पढ़ते हुए देश दुनिया को समझ सकें। ज़रूरी नहीं कि आप भक्त से नो भक्त बन जाएं मगर जान कर भक्त बने रहना अच्छा है, कम से कम अफसोस तो नहीं होगा कि धोखा खा गए।

अब देखिए, मूल सवालों पर चर्चा न हो इसलिए सरकार या भाजपा का कोई न कोई नेता इतिहास के गड़े मुर्दे उखाड़ लाता है। वो भी ग़लत सलत। तू तू मैं मैं की पोलिटिक्स चलाने के लिए। हर दिन आप चैनल खोल कर खुद से देख लें, पता चलेगा कि देश कहां जा रहा है। जिन नेताओं के पास जनता की समस्या पढ़ने और निराकरण का वक्त नहीं है, वो अचानक ऐसे बयान दे रहे हैं जैसे सुबह सुबह उठते ही इतिहास की एक किताब ख़त्म कर लेते हैं। उसमें भी गलत बोल देते हैं।

अब देखिए प्रधानमंत्री मगहर गए। कबीर की जयंती मनाने। वहां भाषण क्या दिया। कितना कबीर पर दिया और कितना मायावती अखिलेश पर दिया, इससे आपको पता चलेगा कि उनके लिए कबीर का क्या मतलब है। जब खुद उनकी पार्टी मज़ार मंदिर जाने की राहुल गांधी की राजनीति की आलोचना कर चुकी है तो इतनी जल्दी तो नहीं जाना चाहिए था। जब गए तो ग़लत सलत तो नहीं बोलना था।

मगहर में प्रधानमंत्री ने कहा कि " ऐसा कहते हैं कि यहीं पर संत कबीर, गुरु नानक देव जी और गुरु गोरखनाथ एक साथ बैठकर आध्यात्मिक चर्चा करते थे" जबकि तीनों अलग अलग सदी में पैदा हुए। कर्नाटक में इसी तरह भगत सिंह को लेकर झूठ बोल आए कि कोई उनसे मिलने नहीं गया।

आप सोचिए, जब प्रधानमंत्री इतना काम करते हैं, तो उनके पास हर दूसरे दिन भाषण देने का वक्त कहां से आता है। आप उनके काम, यात्राओं और भाषण और भाषणों में ग़लत सलत तथ्यों को ट्रैक कीजिए, आपको दुख होगा कि जिस नेता को जनता इतना प्यार करती है, वो नेता इतना झूठ क्यों बोलता है। क्या मजबूरी है, क्या काम वाकई कुछ नहीं हुआ है।

आज नहीं, कल नहीं, साठ साल बाद ही सही, पूछेंगे तो सही। कबीर, नानक और गोरखनाथ को लेकर ग़लत बोलने की क्या ज़रूरत है। क्या ग़लत और झूठ बोलने से ही जनता बेवकूफ बनती है? क्या भारत को विश्व गुरु बनाने की बात करने वाले मोदी भारत को बेवकूफ बनाना चाहते हैं?

Tuesday, 26 June 2018

..वो फूल खिल के रहेंगे जो खिलने वाले हैं

अदम्य साहस, शौर्य और कौशल के प्रतीक सपूत को श्रद्धांजलि

राज बहादुर सिंह

कैबिनेट की मीटिंग चल रही थी। अचानक पीएम ने इशारा किया। दरवाजा खुला और एक रोबीले शख्स ने भीतर कदम रखा और इशारा पाकर बैठ गया। पीएम ने पूछा क्या हम हमला करने के लिए तैयार हैं। रोबीले शख्स ने माहौल का सरसरी तौर पर जायजा लिया और सपाट लहजे में कहा 'नो'। और फिर मौसम से लेकर आर्मी की तैयारी और कुछ रणनीतिक बातें कहीं। पीएम ने कैबिनेट मीटिंग खत्म करने का और उस शख्स को रुकने का इशारा किया।

मंत्रियों के बाहर जाते ही उस शख्स ने खड़े होकर कहा '' मैडम प्राइम मिनिस्टेट, आई आफर टू रिजाइन''। पीएम ने कहा '' नो''. और पूछा क्या करना चाहिए। उस शख्स ने कहा मुझे ऑपरेशन्स की आज़ादी चाहिए। क्या करना है कैसे करना है इस मे कोई दखल नहीं होना चाहिए और कब करना है यह भी मैं तय करूंगा। ऐसा होने पर मैं  जीत की गारंटी देता हूँ। पीएम ने कुछ क्षण सोचा और कहा '' यू गॉट इट'।

और यूं बनी रूप रेखा और फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ की अगुवाई में भारत ने 1971 में पाकिस्तान को न केवल शिकस्त दी बल्कि बांग्लादेश बनवाकर हमेशा टीस देने वाला जख्म भी दिया। आज देश के पहले फील्ड मार्शल
, पदम् विभूषण और पदम् भूषण से सम्मानित सैम मानेकशॉ की पुण्य तिथि है। आइए एक नजर डालते हैं भारत मां के इस अमर सपूत पर और जाने कि क्यों यह शख्स अलग था, विलक्षण था और क्यूं नमन योग्य है।

आप चौंक सकते हैं यह जान कर कि मानेकशॉ के ऊपर देशद्रोह का केस चलाया गया जब नेहरु पीएम थे और उनके मुंह लगे वीके कृष्ण मेनन रक्षा मंत्री थे। मानेकशॉ थोड़े मुंहफट थे और उन्होंने कहीं कथित टिप्पणीं की कि सेना में पोलिटिकल लीडरशिप का दखल बहुधा अनावश्यक होता है। कृष्ण मेनन ने एक बार उनसे पूछा कि तत्कालीन आर्मी चीफ केएस थिमैया के बारे में उनकी क्या राय है। मानेकशॉ ने कहा कि मैं अपने चीफ के बारे में कोई राय आपको नहीं दूंगा क्योंकि फिर आप मेरे मातहत अफसरों से यही सवाल मेरे बारे में करेंगे।

जाहिर था कि नकचढ़े मेनन इससे चिढ़ गए और देशद्रोह का केस इसी पृष्ठभूमि से निकला हालांकि मानेकशॉ इससे बरी हो गए। चीन से लड़ाई के समय भी उन्होंने अपनी मतभिन्नता पीएम नेहरू और उनके प्रिय मेनन से प्रकट की और आखिरकार मेनन को चीन से हार के बाद बर्खास्त किया गया।

मानेकशॉ 1969 में आर्मी चीफ बने और 1971 में पाकिस्तान की पराजय के बाद उन्हें फील्ड मार्शल बनाया गया और वह पहले आर्मी ऑफिसर थे जिन्हें यह सम्मान मिला। मानेकशॉ ने सेना में जातिगत आरक्षण का विरोध किया। उन्होंने आर्मी को वॉर मशीनरी में बदलने के लिए उल्लेखनीय प्रयास किए। रिटायर होने के बाद भी वह एक्टिव रहे और तमाम बड़ी कंपनियों के बोर्ड में रहे।

ऐसी ही एक कंपनी के बोर्ड से जब उन्हें सरकार के इशारे पर हटाया गया और उनकी जगह नायक नाम वाले व्यक्ति को बोर्ड में लिया गया तो मानेकशॉ ने दिलचस्प टिप्पणी की - This is the first time when a Nayak (corporal) has replaced a Field Marshal.

मानेकशॉ 1973 में रिटायर हुए लेकिन उनके बकाए भत्ते का भुगतान तीस साल बाद तत्कालीन राष्ट्रपति एपेजी अब्दुल कलाम ने उनके घर जाकर 1.3 करोड़ का चेक देकर किया। मानेकशॉ से जुड़े तमाम प्रेरणादायक किस्से हैं। कुल मिलाकर एक अनोखे व्यक्तित्व और प्रचंड देशभक्त ने 27 जून  2008 को आखिरी सांस ली । शत शत नमन। कुछ यू कहें तो ठीक होगा -

हज़ार बर्क गिरे और लाख आंधियां उठें
वो फूल खिल के रहेंगे जो खिलने वाले हैं

जन्म से लेकर मृत्यु तक..

चित्रगुप्त - कहाँ पैदा होना चाहते हो ?

आत्माराम - एम. पी. या छ. ग. की रानी भिखारन के पेट में डाल दीजिए महाराज ।

चित्रगुप्त - भई टाटा अम्बानी अडानी लायक तो तुम्हारी औकात नहीं ये ठीक पर .. कोई मिडल क्लास चुन लेते ।

आत्माराम - पागल हूँ क्या ?

बाप उधार लेकर अस्पताल का बिल चुकाकर पैदा करे ..
पाई पाई जोड़कर पढ़ाये ..

जिस जाति धर्म में पैदा हुए उसके हिसाब से पढ़ो लड़ो .. कम्पटीशन करो .. नौकरी खोजते 35 के हो जाओ तब भी शादी नहीं न ठिकाना ..  ऊपर से ये टैक्स .. वो टैक्स ।

डालिये रानी भिखारन के पेट में .. तीन झुग्गियां तो तनी ही थी .. अगले महीने सरकारी घर भी मिलने वाला है ।

पेट में आते ही पूरे 9 महीने सरकारी डॉक्टर खुद घर आकर देखेंगे ( हिरण्यगर्भा योजना )
पैदा 9000 लेकर होऊंगा ( जननी योजना )
पैदा होते ही पालने को मामा है ही .. और पढ़ाने लिखाने भी .. भले ही अपन न पढ़ें ( कितनी योजनाएं बताऊं )

फिर अपन को भी एक सरकारी फ्लैट जिसे किराए पर उठाकर नई झुग्गी तान लो  .. फिर ये भत्ता .. वो भत्ता .. मुफ्त सिलेंडर .. रुपये किलो चावल दाल .. 2 दिन काम करो और सोम की दारू पीकर पांच दिन गरराओ ..

फिर बस इक्कीस का होना है मामा शादी कर देगा जिसके लिए छोरी मास्टर खोजकर देंगे और शादी का पूरा  खर्च मामा देगा कन्यादान करके ( मुख्यमंत्री कन्यादान योजना )  ..
बस करना क्या है फिर .. जुट जाना है .. एक और अपन सा भेज देना हरामखोर जो इन सबके बदले बस एक बटन दबा दे  ।

( बस छोरी न बनाना महाराज .. क्यों ? ये तो आपको पता ही है .. वैसे भी इतना पापी तो मैं हूँ नहीं जो छोरी बनाएं आप )
.... ..... ......

चित्रगुप्त कोमा में .. इलाज जारी ।
... ....

कम लिखा .. ज्यादा पढ़ना जी ( पुराने जमाने की चिट्ठी की पंक्ति )

Monday, 25 June 2018

भीड़ का अट्टाहास

भीड़ बहुत अच्छी है, अगर आपके पक्ष में खड़ी हो। भीड़ बहुत बुरी अगर आपके खिलाफ हो। भीड़ जब आपके लिए लाठी और त्रिशूल भांजे तो आप अट्टाहास करते हैं। भीड़ जब आपके खिलाफ भारत बंद करवाने पर उतारू हो जाये तो आपके देश को होने वाले आर्थिक नुकसान की चिंता सताने लगती है।
दलितों के भारत बंद ने भारतीय राजनीति और समाज की कुछ भयावह सच्चाइयों को उजागर किया है। पहली बात यह कि संगठित आक्रमकता ही अपनी बात मनवाने का एकमात्र और स्वीकृत तरीका है।
याद कीजिये तमिलनाडु आकर जंतर-मंतर पर धरना दे रहे किसानो को। गले में खोपड़ी की माला, मुंह में मरे चूहे दबाये। पेशाब पीकर अपनी हालत बयान करते किसान। आंदोलन पूरी तरह अहिंसक था। राष्ट्रीय मीडिया पर कवरेज शून्य था। सोशल मीडिया पर लोग तालियां पीट-पीटकर हंस रहे थे। किसान कई दिनों तक बैठे रहे और फिर वापस चले गये। उनकी मांगों का क्या हुआ किसी को पता नहीं है।
अब आरक्षण की मांग कर रहे जाटों के आंदोलन को लीजिये। बसे जलाई गईं। निर्दोष राहगीरों की हत्या की गई। बलात्कार तक के मामले सामने आये। हरियाणा के मुख्यमंत्री ने फौरन जाट भाइयों को बातचीत का न्यौता दिया। आश्वसान दिया गया कि सारे मुकदमे वापस लिये जाएंगे। उसके बाद यूपी चुनाव के दौरान राष्ट्रीय अध्यक्ष जी का ऑडियो आया-- जाट नेताओं को पुचकारते, ऐतिहासिक संबंधों की दुहाई देते।
हार्दिक पटेल ने गुजरात में हिंसा फैलाई और रातो-रात हीरो बन गया। उसे मनाने की भरपूर कोशिशें हुईं। लेकिन मुकदमों की वजह से वह इस तरह बिदका कि कांग्रेस के पाले में चला गया। इस तरह हार्दिक पटेल देशद्रोही हो गया लेकिन हिंसक पाटीदार आंदोलन से जुड़े उसके जो साथी बीजेपी के साथ आये वे सब देशभक्त हो गये।
21वीं सदी सबसे बड़े गांधीवादी योगी आदित्यनाथ इस देश के नये पोस्टर ब्वाय हैं, जिन्हे हिंदू वाहिनी नाम का एक हथियारबंद दस्ता स्थापित करने का श्रेय जाता है। बाबाजी भारत के पहले ऐसे नेता हैं, जो सांवैधानिक पद पर बैठकर एक्स्ट्रा ज्यूडीशियल किलिंग को सबसे पवित्र काम के रूप में स्थापित कर रहे हैं और वाहवाही लूट रहे हैं। योगी जी पहले ऐसे नेता हैं, जिन्होने मुख्यमंत्री बनने के बाद अपने उपर लगे सारे आपराधिक मामले हटा लिये।
दूसरी तरफ दलित नेता चंद्रशेखर आजाद रावण का हाल भी सुन लीजिये। कानूनी दांव-पेंच में फंसाकर लगभग गैर-कानूनी तरीके से जेल में बंद किया गया है और अपाहिज हो चुका है। ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे। क्या चंद्रशेखर आज़ाद रावण की जगह उसका नाम संगीत सोम होता तब भी उसकी यह हालत होती? मरे हुए जानवर की खाल उतार रहे लोगो की खाल खींच ली जाती है। घोड़ी चढ़ने वालों की गर्दन काट दी जाती है और इस देश की सबसे बड़ी अदालत को लगता है कि एसटीएसी एक्ट का दुरुपयोग हो रहा है। जातिवादी पूर्वाग्रह की जड़े इस देश में कल्पनाओं से भी ज्यादा गहरी हैं।
दलित आंदोलन के दौरान हुई हिंसा देखकर बहुत दुख हुआ। जब आप न्याय की मांग कर रहे हों तो कोशिश इस बात की होनी चाहिए कि आचरण भी विधिसम्मत हो। हिंसा नहीं होनी चाहिए थी। लेकिन हिंसा की चिंता इस देश में किसे है? गांधी की तरह चरखा कातते हुए फोटो खिंचवाने वाले प्रधानमंत्री ने समाज में बढ़ रही हिंसा के बारे में कितनी बार क्या बोला है यह याद कर लीजिये और याद आ जाये तो मुझे भी बता दीजियेगा।

Sunday, 24 June 2018

पद और उसकी गरिमा..

ताली बजाकर, हाथ नचाकर दुश्मनों का ससुराल-मायका और ननिहाल-ददिहाल को याद करने वाले  किरदार सास बहू के सीरियल में होते हैं। देश के शीर्षस्थ पदों पर नहीं। बहुत ताज्जुब होता है जब देश के प्रधानमंत्री को ऐसी हरकते करता देखता हूं।
`पैसे मामा के घर से लाये थे, क्या?  मां जर्सी गाय और बेटा बछडा़ है। अपनी मां की मातृभाषा में ही 15 पंद्रह मिनट भाषण देकर दिखा दो'।
कोई भी सामान्य आदमी लगातार ऐसी भाषा नहीं बोल सकता है। यहां मैं यह सवाल नहीं पूछ रहा है कि देश के प्रधानमंत्री असली मुद्दों पर बात क्यों नहीं करते। अगर उनके वोटर इसी संवाद शैली से खुश हैं तो उन्हे ऐसी ही भाषा में बात करते रहने का पूरा अधिकार है। फिर भी कुछ सीमाएं तो होती हैं।
राहुल गांधी की मां विदेश में पैदा होंगी क्या यह राहुल ने तय किया था?  हालांकि मोदीजी अवतारी पुरुष हैं फिर भी मैं इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं हूं कि उन्होने भगवान से कहा होगा कि मुझे वडनगर के चायवाले के घर में ही पैदा करना, अंबानी के यहां नहीं। अगर कहा भी होता तो भगवान ऐसा करते यह ज़रूरी नहीं है। भगवान कोई आरबीआई की गर्वनर तो हैं नहीं कि इधर मोदीजी ने नोटबंदी कही और उधर मुहर लग गई।
बात सिर्फ इतनी है कि जो व्यक्ति जिस बात के लिए जिम्मेदार नहीं है, उसे लेकर हमला क्यों बोलना? कर्नाटक सरकार की आलोचना करने के सैकड़ो जायज कारण हो सकते हैं, आप उन कारणों पर बात कीजिये। कड़ी से कड़ी तथ्यपरक आलोचना कीजिये, रोका किसने है? लेकिन आपने राहुल गांधी की मां के विदेश में पैदा होने का मुद्धा इसलिए चुना है क्योंकि आपको लगता है कि यह कमजोर नस है, जिसे पकड़ते ही सामने वाला आदमी बिलबिलाने लगेगा लेकिन बोल कुछ नहीं पाएगा। लेकिन कमज़ोर नस किसकी नहीं होती है। अब ज़रा ये सोचिये कि राहुल गांधी देश के प्रधानमंत्री के दिखाये रास्ते पर चल पड़े तो क्या होगा।
राहुल अपनी हर सभा में यह कहे कि देश में ठुकराई महिलाओं की दशा बहुत खराब है, सरकार के आते ही `जसोदा योजना' लागू की जाएगी। मान लीजिये राहुल गांधी अपनी हर रैली की शुरुआत जसोदा माता के भजन से शुरू करने लगे तो कैसा रहेगा?
कांग्रेस पार्टी यह कहे कि सरकार में आते ही फर्जी डिग्री धारियों की धर-पकड़ की जाएगी और सबको जेल भेजा जाएगा तो सुनने में कैसा लगेगा? अगर दो सबसे बड़ी पार्टियों के बीच छिछोरेबाजी की प्रतियोगिता शुरू हो गई तो उसके नतीजे बहुत ही खराब होंगे। शुक्र है, अपनी तमाम कमियों के बावजूद कांग्रेस पार्टी विरोधी को `उसी की भाषा में जवाब' देने वाले तर्क पर नहीं चल रही है।
केंद्र सरकार चार साल से है। इस दौरान मैने बहुत कम ऐसे पोस्ट लिखे हैं, जिसमें सीधे-सीधे प्रधानमंत्री का नाम लिया गया हो। मुझे मालूम है कि वे 24 घंटे में 20 घंटे काम करते हैं। पद की गरिमा बनाये रखने का एडिशनल काम वे अपने जिम्मे नहीं ले सकते हैं। प्रधानमंत्री पद की गरिमा बनाये  रखने की जिम्मेदारी भी देश के नागरिकों को ही उठानी पडे़गी।

आपबीती - बी.जे.पी

हमने पिछले सालों में जो कुछ किया वो आनेवाली पीढ़ी के लिए चुटकुला होगा.
वो हंसेंगे कि कैसे हमने एक हज़ार के नोटों से फैल रहे भ्रष्टाचार को खत्म करने के नाम पर दो हज़ार का नोट जारी कर दिया था.
वो हंसेंगे कि कैसे हमने सरकार की असफलता को मिलकर दबाने के लिए मान लिया था कि असली नोट रंग छोड़ता है.
वो हम पर इसलिए भी हंसेंगे क्योंकि हमने एफडीआई, जीएसटी, आधार को नकारनेवालों को पूरे जोश में चुना और फिर जब उन्होंने भी यही लागू किया तो अचानक हम भी इनके फायदों को साबित करने लगे.
उन्हें हंसी आएगी कि हम ही थे जिन्होंने योगी, साक्षी, बिप्लब जैसों को एक ही वक्त पर चुना और नेता माना.
उनको हैरत से हंसी छूटेगी कि विज्ञान से चमकती बीसवीं सदी के अंत के बाद हमने ऐसे लोगों को देश सौंपा जो गणेश की सर्जरी, महाभारत में इंटरनेट और पुष्पक की थ्योरी बाकायदा सिलेबस में डालने पर आमादा थे.
वो हंसेंगे और उस दिन हमें भी अहसास होगा कि हां यार वाकई बेवकूफी तो हुई थी.

नेहरू से लड़ते लड़ते अपने भाषणों में हारने लगे हैं मोदी ?

प्रधानमंत्री मोदी के लिए चुनाव जीतना बड़ी बात नहीं है। वे जितने चुनाव जीत चुके हैं या जीता चुके हैं यह रिकार्ड भी लंबे समय तक रहेगा। कर्नाटक की जीत कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन आज प्रधानमंत्री मोदी को अपनी हार देखनी चाहिए। वे किस तरह अपने भाषणों में हारते जा रहे हैं। आपको यह हार चुनावी नतीजों में नहीं दिखेगी। वहां दिखेगी जहां उनके भाषणों का झूठ पकड़ा जा रहा होता है। उनके बोले गए तथ्यों की जांच हो रही होती है। इतिहास की दहलीज़ पर खड़े होकर झूठ के सहारे प्रधानमंत्री इतिहास का मज़ाक उड़ा रहे हैं। इतिहास उनके इस दुस्साहस को नोट कर रहा है।  

प्रधानमंत्री मोदी ने अपना शिखर चुन लिया है। उनका एक शिखर आसमान में भी है और एक उस गर्त में हैं जहां न तो कोई मर्यादा है न स्तर है। उन्हें हर कीमत पर सत्ता चाहिए ताकि वे सबको दिखाई दें शिखर पर मगर ख़ुद रहें गर्त में। यह गर्त ही है कि नायक होकर भी उनकी बातों की धुलाई हो जाती है। इस गर्त का चुनाव वे ख़ुद करते हैं। जब वे ग़लत तथ्य रखते हैं, झूठा इतिहास रखते हैं, विरोधी नेता को उनकी मां की भाषा में बहस की चुनौती देते हैं। ये गली की भाषा है, प्रधानमंत्री की नहीं। 

दरअसल प्रधानमंत्री मोदी के लिए नेहरू चुनौती बन गए हैं। उन्होंने खुद नेहरू को चुनौती मान लिया है। वे लगातार नेहरू को खंडित करते रहते हैं। उनके समर्थकों की सेना व्हाट्स अप नाम की झूठी यूनिवर्सिटी में नेहरू को लेकर लगातार झूठ फैला रही है। नेहरू के सामने झूठ से गढ़ा गया एक नेहरू खड़ा किया जा रहा है। अब लड़ाई मोदी और नेहरू की नहीं रह गई है। अब लड़ाई हो गई है असली नेहरू और झूठ से गढ़े गए नेहरू की। आप जानते हैं इस लड़ाई में जीत असली नेहरू की होगी।

नेहरू से लड़ते लड़ते प्रधानमंत्री मोदी के चारों तरफ नेहरू का भूत खड़ा हो गया। नेहरू का अपना इतिहास है। वो किताबों को जला देने और तीन मूर्ति भवन के ढहा देने से नहीं मिटेगा। यह ग़लती खुद मोदी कर रहे हैं। नेहरू नेहरू करते करते वे चारों तरफ नेहरू को खड़ा कर रहे हैं। मोदी के आस-पास अब नेहरू दिखाई देने लगे हैं। उनके समर्थक भी कुछ दिन में नेहरू के विशेषज्ञ हो जाएंगे, मोदी के नहीं। भले ही उनके पास झूठ से गढ़ा गया नेहरू होगा मगर होगा तो नेहरू ही। 

प्रधानमंत्री के चुनावी भाषणों को सुनकर लगता है कि नेहरू का यही योगदान है कि उन्होंने कभी बोस का, कभी पटेल का तो कभी भगत सिंह का अपमान किया। वे आज़ादी की लड़ाई में नहीं थे, वे कुछ नेताओं को अपमानित करने के लिए लड़ रहे थे। क्या नेहरू इन लोगों का अपमान करते हुए ब्रिटिश हुकूमत की जेलों में 9 साल रहे थे?  इन नेताओं के बीच वैचारिक दूरी, अंतर्विरोध और अलग अलग रास्ते पर चलने की धुन को हम कब तक अपमान के फ्रेम में देखेंगे। इस हिसाब से तो उस दौर में हर कोई एक दूसरे का अपमान ही कर रहा था। राष्ट्रीय आंदोलन की यही खूबी थी कि अलग अलग विचारों वाले एक से एक कद्दावर नेता थे। ये खूबी गांधी की थी। उनके बनाए दौर की थी जिसके कारण कांग्रेस और कांग्रेस से बाहर नेताओं से भरा आकाश दिखाई देता था। गांधी को भी यह अवसर उनसे पहले के नेताओं और समाज सुधारकों ने उपलब्ध कराया था। मोदी के ही शब्दों में यह भगत सिंह का भी अपमान है कि उनकी सारी कुर्बानी को नेहरू के लिए रचे गए एक झूठ से जोड़ा जा रहा है।

भगत सिंह और नेहरू को लेकर प्रधानमंत्री ने जो ग़लत बोला है, वो ग़लत नहीं बल्कि झूठ है। नेहरू और फील्ड मार्शल करियप्पा, जनरल थिम्मैया को लेकर जो ग़लत बोला है वो भी झूठ था।   कई लोग इस ग़लतफ़हमी में रहते हैं कि प्रधानमंत्री की रिसर्च टीम की ग़लती है। आप ग़ौर से उनके बयानों को देखिए। जब आप एक शब्दों के साथ पूरे बयान को देखेंगे तो उसमें एक डिज़ाइन दिखेगा। भगत सिंह वाले बयान में ही सबसे पहले वे खुद को अलग करते हैं। कहते हैं कि उन्हें इतिहास की जानकारी नहीं है और फिर अगले वाक्यों में विश्वास के साथ यह कहते हुए सवालों के अंदाज़ में बात रखते हैं कि उस वक्त जब भगत सिंह जेल में थे तब कोई कांग्रेसी नेता नहीं मिलने गया। अगर आप गुजरात चुनावों में मणिशंकर अय्यर के घर हुए बैठक पर उनके बयान को इसी तरह देखेंगे तो एक डिज़ाइन नज़र आएगा।

बयानों के डिज़ाइनर को यह पता होगा कि आम जनता इतिहास को किताबों से नहीं कुछ अफवाहों से जानती है। भगत सिंह के बारे में यह अफवाह जनसुलभ है कि उस वक्त के नेताओं ने उन्हें फांसी से बचाने का प्रयास नहीं किया। इसी जनसुलभ अफवाह से तार मिलाकर और उसके आधार पर नेहरू को संदिग्ध बनाया गया। नाम लिए बग़ैर कहा गया कि नेहरू भगत सिंह से नहीं मिलने गए। यह इतना साधारण तथ्य है कि इसमें किसी भी रिसर्च टीम से ग़लती हो ही नहीं सकती। तारीख या साल में चूक हो सकती थी मगर पूरा प्रसंग ही ग़लत हो यह एक पैटर्न बताता है। ये और बात है कि भगत सिंह सांप्रदायिकता के घोर विरोधी थे और ईश्वर को ही नहीं मानते थे। सांप्रदायिकता के सवाल पर नास्तिक होकर जितने भगत सिंह स्पष्ट हैं, उतने ही आस्तिक होकर नेहरू भी हैं। बल्कि दोनों करीब दिखते हैं। नेहरू और भगत सिंह एक दूसरे का सम्मान करते थे। विरोध भी होगा तो क्या इसका हिसाब चुनावी रैलियों में होगा।

नेहरू का सारा इतिहास मय आलोचना अनेक किताबों में दर्ज है। प्रधानमंत्री मोदी अभी अपना इतिहास रच रहे हैं। उन्हें इस बात ख़्याल रखना चाहिए कि कम से कम वो झूठ पर आधारित न हो। उन्हें यह छूट न तो बीजेपी के प्रचारक के तौर पर है और न ही प्रधानमंत्री के तौर पर। कायदे से उन्हें इस बात के लिए माफी मांगनी चाहिए ताकि व्हाट्स अप यूनिवर्सिटी के ज़रिए नेहरू को लेकर फैलाए जा रहे ज़हर पर विराम लगे। अब मोदी ही नेहरू को आराम दे सकते हैं। नेहरू को आराम मिलेगा तो मोदी को भी आराम मिलेगा।

डर...

अखबारों ने बताया,टीवी पर सुना है, डरने लगे हैं आप हिंदुस्तान में, ये कैसा डर है... 130 करोड़ के देश के प्रधानमंत्री को गालियां देते हुए, ...