Saturday, 5 January 2019

डर...

अखबारों ने बताया,टीवी पर सुना है,
डरने लगे हैं आप हिंदुस्तान में,
ये कैसा डर है...
130 करोड़ के देश के प्रधानमंत्री को गालियां देते हुए,
आप दहाड़ रहे हैं टीवी पर,सभाओं में,
उसके बाद आप कहते हैं कि आप को डर लगने लगा है..

80 करोड़ लोगों की श्रद्धा गाय को
सड़को पर काटकर, शहर की हर गली में
गाय के मांस की पार्टी करते हुए कहते हैं कि
गाय खाऊंगा,किसी की हैसियत नही की रोक सके..
और आप कहते हैं कि आप डरने लगे हैं...

आप टीवी डिबेट में,
42 लाख सैनिको से सुसज्जित भारतीय सेना को,
चीख चीख कर बलात्कारी और हत्यारा कहते हैं.
फिर भी आप जिंदा है..
और आप कहते हैं कि आप डरने लगे हैं...

आप भारत के जवानों के मारे जाने पर,
जेएनयू में जश्न मनाते हैं,
भारत की बर्बादी के नारे लगाते हैं,
फिर भी आप भारत में शान से जिंदा हैं,
और सुना है आपको डर लगने लगा है।

आप दुर्गा माता को वेश्या कहते हैं,
महिषासुर को अपना बाप बताते हैं,
एमएफ हुसैन जैसे आप के भाई,
दुर्गा,सरस्वती और लक्ष्मी माँ की,
नंगी पेंटिंग बनाते हैं,
फिर भी जनता आप को घसीट कर जिंदा नही जलाती,
और सुना है आपको डर लगने लगा है।

डर लगता है जनाब..मुझे भी लगा था..
मगर आप नही डरे,
आप के पुरस्कार आलमारियों से,
वापस करने के लिए तब
नही निकले..
मैं बताता हूँ, की मैं कब कब डरा
और आप नही डरे,
पुरस्कार लेते रहे या
बेगम के होठों के रस पीते रहे...

मैं डरा था मगर आप नही डरे ,
लक्ष्मी पूजा के दिन नोआखली में,
डायरेक्ट एक्शन डे के नाम पर,
हजारो हिंदुओं को मुस्लिम लीग के गुंडों ने
गला काट के मार दिया,
उनके बेटे भाई और पति के सामने
एक मां, एक बहन का सामूहिक बलात्कार हुआ,
मुर्दा लाशों को गिद्धों ने नोचा,
जिंदा लाशों को मुश्लिम लीग के जेहादी नोचते रहे..
पति की लाश के सामने बलात्कार के बाद,
गीता देवी को,रेशम खातून बनाया गया....
उस दिन अहिंसा का पुजारी भी मौन था,
या यूं कह ले आपके साथ खड़ा था..
मैं उस दिन बहुत डरा था मगर आप नही डरे ...

मैं डरा था मगर आप नही डरे ,
1984 में ,
जब हजारों सिक्खों के गले मे
टायर डालकर,कांग्रेसी गुंडों ने,
उन्हें जिंदा जला दिया,
महिलाओं का बलात्कार किया..
3 दिन चले इस जनसंहार के बाद
मैं डरा था मगर आप नही डरे ,
क्या आप जानते हैं,आप की बिरादरी के कुछ भांड़,
भोपाल में उसी समय पुरस्कार ले रहे थे..

मैं डरा था मगर आप नही डरे ,
1989 में ,
जब कश्मीर में हिंदुओं के घर पर,
नोटिस चिपकाई गई,अखबारों में छपा,
"हिंदुओं कश्मीर छोड़ दो,
और अपनी बहन बेटियां हमारे लिए छोड़ दो"
मैं डरा था मगर आप नही डरे, जब कश्मीर में
इस्लाम स्वीकार करो या मरो के नारे के साथ,
मेरी 3 माह की बिटिया का बलात्कार कर,
कश्मीर के चौराहे पर उसकी लाश,
बंदूक के संगीन पर टंगी मिली,
और उसकी माँ को औरंगजेब की औलादों ने
महीनों तक नोचा.
मैं डरा था,
जब अल्ला हो अकबर के नारों के साथ,
रामलाल के उस चंदन लगे ललाट पर,
अहमद ने कील ठोक ठोक कर मार डाला,
जो रामलाल, अहमद का पड़ोसी था...
उस दिन मैं डरा था मगर आप नही डरे..
साढ़े चार लाख लोग कश्मीर में अपने घरों से भगा दिए गए,
वो जीवित गवाह हैं इस डर के...
उस दिन मैं डरा,सभी डरे मगर आप नही डरे.

मैं डरा था मगर आप नही डरे ,
2 नवंबर 1990 को अयोध्या में ,
जब रामभक्तों पर अपने ही देश में,
हेलीकाप्टर से गोलियां चलवाकर,
सरयू की धारा को,
हिंदुओं के खून से लाल कर दिया गया..
मैं डरता था,जब महीनों बाद तक,
रामभक्तो की गोलियों से छलनी बोरे में भारी लाश..
सरयू नदी से मिलती रही...
मैं डरा था मगर आप नही डरे।

मैं डरा था मगर आप नही डरे ,
27 फ़रवरी 2002 गोधरा में,
जब मस्जिद से ऐलान हुआ कि,
जिंदा जला दो काफिरों को,
और ट्रेन में बन्द करके,अल्ला हो अकबर के नारों के साथ,
59 रामभक्तों को जिंदा जला कर कोयला बना डाला गया।
उन जलती हुई महिलाओं,बच्चों,बूढ़ों की चीख से,
मैं डरा था मगर आप नही डरे ....

मैं डरता रहा,
कभी संकटमोचन मंदिर में बम से हुए चीथड़ों को देखकर
कभी दीवाली पर खून से लथपथ दिल्ली की सड़कों को देखकर,
कभी जयपुर की गलियों में माँ के चिथड़े हुए लाश पर,
बच्चे को रोता देखकर,
कभी अहमदाबाद में बम से चिथड़े होता रहा..
कभी मुम्बई हमले से ,
तो कभी लोकल ट्रेन में बम ब्लास्ट से मैं डरता रहा..
आपकी इटालियन अम्मी
आतंकवादियों की लाश पर फूट फूट कर रोटी रहीं,
मैं डरता रहा,मगर आप नही डरे...
आप नही डरे,
क्योंकि आप व्यस्त थे याकूब और अफजल
जैसे आतंकी की फांसी रुकवाने के लिए,
आधी रात को कोर्ट खुलवाने में
एक आतंकवादी की फांसी को न्यायिक हत्या बताने में,
उस दिन आप नही डरे क्योंकि आप व्यस्त थे,
जेहादियों को अपना बाप बनाने में....

आप के शब्दकोश में "माब लीचिंग" 2014 तक नही आया था,
क्योंकि हमें डराने वालों ने आपको हड्डियां बहुत खिलाया था...

अचानक 2014 में एक सन्यासी आया,
जिसने मेरा डर खत्म किया और आप डरने लगे,
आप डरे क्योंकि अब हम चिथड़े नही होते,
आप को हमारी बेटियों को नोचने की छूट नही..
आप को अब आप की भाषा में जबाब मिलने लगा.

ये डर कही  उस सन्यासी से तो नही,
सुना है आप "एक" के अलावा किसी से नही डरते,
तो क्या इस सन्यासी की इबादत का इरादा है??

आप डर इसलिए रहे हैं क्योंकि
अब मैंने डरना छोड़ दिया..
और विश्वास मानिये,
ये डर जिंदा रहना चाहिए,
मुझे आप का ये डर अच्छा लगा..

Friday, 4 January 2019

4 साल 😂😂😂

70 साल में कुछ नही हुआ, अभी 4 साल पहले हम को पता चला

#ऑक्सीजन लेनी होती है जीने के लिये,70 साल से मिट्टी का तेल सूंघ के जी रहे थे ।

4 साल पहले #रेल सेवा शुरू हुई 70 साल से पटरी केवल खाद बनाने के काम आती थी

4 साल पहले लोग #प्लेन में बैठ कर उड़ना शुरू किये,70 साल तक तो कुतुब मीनार से कूद कर उड़ने की कोशिश करते थे हम

4 साल पहले #बैंक के बारे में जाना भारतीयों ने ,70 साल से अपना पैसा जमीन में खोद के डाल देते थे हम

4 साल पहले कम्प्यूटर/प्रिंटर आदि के बारे में पता चला, 70 साल से #टाइपराइटर से फोटोकॉपी करते रहे

4 साल पहले नोट #करंसी के रूप में मिले, 70 साल से अशर्फियां ही देखते आये हम

4 साल पहले हमें इलाज कराने को अस्पताल मिले,70 साल से बिमार होने पर #सल्फ़ास चाट लेते थे

4 साल पहले बिजली आई,70 साल तक #जुगनू को पाल पोस के गुजारा हो रहा था

4 साल पहले गैस मिली,70 साल से पत्थर रगड़ कर #आग पैदा कर रहे थे

4 साल पहले फौज के पास हथियार आये लड़ने को,70 साल से चोर सिपाही खेल के लड़ाइयों का फैसला होता था

4 साल पहले #युवा एक्टिव हुए हैं, 70 साल से सोते हुए भी थक जाते थे ।

4 साल पहले आधुनिक एम्स ओर अन्य चिकित्सा सुविधा मिलनी शुरू हुई #70 साल से तो एलियन आते थे इलाज करने।

4 साल में इंस्टिट्यूट ओर अन्य विश्वविद्यालय  बनाये गए #70 साल से तो जंगलो में बरगद के पेड़ के नीचे पढ़ते थे ।

4 साल से ही तो उपग्रह छोड़ने शुरू हुवे #70 साल से तो कंडील छोड़ रहे थे आसमान में।

Wednesday, 2 January 2019

" संघ " और " हम "

एक युवक से फोन पर बातचीत हुई

वो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े रहे

बहुत लम्बी बातचीत में उनकी कई शंकाओं का समाधान हुआ

मैनें उन्हें संघ के सांस्कृतिक पुनरउत्थान के षडयंत्र के बारे में समझाया

संघ कहता है कि हमें भारत का स्वर्ण युग वापिस लाना है

लेकिन भारत मैं कोई स्वर्ण युग था ही नहीं

भारत के अतीत में दास प्रथा है
भारत के अतीत में जात पात है
भारत के अतीत में औरतों की गुलामों जैसी हालत है
भारत के अतीत की झलक देखनी है तो आज के भारत से पीछे को देखना शुरू कीजिये

संघ अतीत की महानता की काल्पनिक कहानियां आपकी दिमागों में भरता हैं

अतीत के गौरवशाली वीर देवता जिन राक्षसों को मार रहे थे वे भारत के दलित और आदिवासी थे

ऋषि मुनि राजाओं के चापलूस पुरोहित थे

राजा असल में व्यापारियों, महाजनों और भूमिवानों की रक्षा करता था

मेहनत करने वाले नीच जात घोषित कर दिये गये

किसान ,कारीगर , मज़दूर नीच जात और गरीब बना दिये गये थे

सारी सामाजिक , राजनैतिक और आर्थिक ताकत राजा, सैन्य अधिकारी , महाजन, भूमिवान और पुरोहितों के पास आ गयी थी ,

आज़ादी के बाद सामाजिक , राजनैतिक और आर्थिक समानता लाना तय हुआ था

लेकिन आज़ादी की लड़ाई से घबरा कर पुराने शासक वर्ग में घबराहट थी

उसी पुराने शासक वर्ग नें अपनी सत्ता बरकरार रखने के लिये संघ का गठन किया

ध्यान दीजिये संध में सवर्ण, धनी लोगों का वर्चस्व है

संघ के लोग आज़ादी की लड़ाई में भगत सिंह , अम्बेडकर , नेहरू , और गांधी का विरोध करते रहे

संघ के लोग हमेशा अंग्रेजों की चापलूसी करते रहे और बराबरी की बात करते वालों पर हमले करते रहे

आज़ादी मिलते ही संघ ने गांधी की हत्या कर दी , अम्बेडकर पर राजनैतिक प्रहार किये

संघ ने समानता की घोषणा करने वाले संविधान को कभी स्वीकार नहीं किया

संघ में शामिल बड़ी जातियों के अमीर , सवर्ण , भूमिपति गिरोह ने मिलकर भारत की राजनीति की दिशा को भटका दिया

इन्होंने कहा भारत की समस्या सामाजिक राजनैतिक या आर्थिक गैर बराबरी नहीं है

बल्कि भारत की समस्या मुसलमान , इसाई और साम्यवादी है

और इसका हल यह है कि भारत में हम हिन्दु गौरव की स्थापना करें , और भारत को हिन्दु राष्ट्र बनायें

हिन्दु राष्ट्र बनाने की मुहिम को भड़काने के लिये आज़ादी मिलते ही बाबरी मस्जिद में राम की मूर्ति रखी गई

मन्दिर निर्माण को हिन्दु गौरव की पुर्नस्थापना का प्रतीक बना दिया गया

संघ द्वारा हिन्दु राष्ट्र बनाने की मुहिम में ओबीसी , दलित और आदिवासियों को एक रणनीति के तहत जोड़ा गया

आज बजरंग दल , शिवसेना , विश्व हिन्दु परिषद में ओबीसी , दलित और आदिवासी बड़ी तादात में मिलेंगे

संघ द्वारा एक तरफ तो इन ओबीसी , दलित, आदिवासियों का इस्तेमाल मुसलमानों और इसाइयों पर हमलों में किया गया

दूसरी तरफ इससे भाजपा को सत्ता में आने में इन वर्गों ने महत्वपूर्ण भूमिका निबाही , क्योंकि संघ के मालिकान सवर्ण भारत की आबादी में अल्पसंख्यक हैं

लेकिन अपनी चालाकी से यह सवर्ण , अमीर कम संख्या में होते हुए भी हिन्दु राष्ट्र का धोखा खड़ा कर के सत्ता पर काबिज़ है

संघ के झ्स हिन्दुत्व के धोखे से सबसे बड़ा नुकसान भारतीय समाज को यह हुआ कि भारत के दलित , ओबीसी और आदिवासी बराबरी के लिये संघर्ष करने की बजाय संघ की वानर सेना बन कर रह गये

इस लिये संघ का स्वर्ण युग की वापसी का नारा दरअसल सवर्ण अमीरों का वर्चस्व बनाये रखने का षडयंत्र है

हम इसलिये संघ का विरोध करते हैं !

Monday, 31 December 2018

" एक्सिडेंटल प्राईम मिनिस्टर "

मै_अनुपम_खेर_जी_की_फ़िल्म_जरूर_देखूंगा

मै देखना चाहूंगा डॉ मनमोहन सिंह साहब ने वैश्विक मंदी होने के बावजूद देश के किसानों का 80000 करोड़ कर्ज माफ करके भी देश की अर्थव्यवस्था को कैसे मजबूत रखा....!

मै यह देखना चाहूँगा की MnREGa जैसी योजना चलाकर 9 साल में 7 करोड़ लोगों की गरीबी रेखा से ऊपर कैसे किया..!

मै यह देखना चाहूँगा की ज्योर्ज बुश को अपने ही देश मे न्यूक्लियर डील पर ऊनकी शर्तों का ना मंजूर करनेका 56'' का सीना डॉ मनमोहन सिंह साहब का..!

मै यह देखना चाहूँगा कश्मीर में शांति कैसे बनाई रखी थी डॉ मनमोहन सिंह साहब ने..!

मै यह देखना चाहूँगा देश कसाब / अफजल को फाँसी चढ़ाएं जाने का मजबूत फैसला कैसे लिया सिंह साहब ने..!

8 सर्जिकल स्ट्राइक करने के बाद भी एक बार भी यह कहकर वोट नही मांगने का जिगर मनमोहन सिंह साहब का..!

मंगलयान छोड़कर अमरीका रशिया चाइना को जवाब दिया उसके बाद मनमोहन सिंह साहब अभिमानी क्यो नही हुवे ..!!

वो लेटर भी देखना चाहूँगा जो पाकिस्तान को मिलने पर पाकिस्तान ने सेना को वापस बुला लिया था..!!

डॉकलाम में युद्ध पोतक जहाज हरक्यूलिस उतारकर डॉ मनमोहन सिंह साहब ने देश को यह क्यों नही बताया कि उन्होंने चाइना को लाल आंखे दिखाई..?

युवाओं को बेरोजगार होने से कैसे बचाया ??

देश को दुनिया की 3rd बड़ी अर्थव्यवस्था कैसे बनाया ??

JNnurm योजना में हर शहर के विकास का ध्यान रखा कभी भाजपा की तरह पक्षपात करने का क्यो नही सोचा ??

विश्व प्रसिद्ध दिल्ही एयरपोर्ट बनाकर भी क्रेडिट क्यो नही लिया ??

RTI मजबूत करने का इरादा कैसे लिया था..?

लड़ाकू विमान तेजस , आईएनएस विशाल , आईएनएस कावेरी , स्कॉर्पिन पनडुब्बी देश मे निर्मित करने का भरोसा कहा से लेकर आये थे ..??

मै यह देखना चाहूंगा FDI के विरोध में सुषमा बुआ का डांस कैसा था..!

वो आधार कार्ड , FDI , GST का विरोध करने वाले CM मोदी का रोल कोंन कर रहा है..!

ऐसे कई काम है जो में देखना चाहूँगा... मगर फ़िल्म में वही पुराने घोटाले का आरोप बताकर... जो आजतक साबित नही हुवे सुप्रीम कोर्ट ने यह आरोप सिर्फ सरकार को बदनाम करने के लिए है कह कर अपने निर्णय बता दिए है...अगर फ़िल्म में वही आरोप बताकर डॉ मनमोहन सिंह साहब को मजबूर बताने का इरादा है तो ये फिल्म झुटी है !

बायोडाटा 😕😋

मैं बायोडेटा नही हूँ .....
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क्यों और क्या दूँ मैं किसी को अपना बायो-डेटा ?  इसमें है ही क्या ? सच तो यही है कि मेरे द्वारा जीवन की कोई त्रिज्या खींची ही नही जा सकी, जिससे कोई परिधि भी बनती और उसमें स्वयं के होने की कोई सूचना भी होती ? 

मेरी मूर्खता और मूढ़ता के विस्तार को कोई 'व्यक्तित्व' कह देने की भूल न करें । आज बहुतों के पास वीरताजन्य उपलब्धियां हैं, और होनी भी चाहिए ? मेरे तो पास स्खलित 'शौर्य-पात' जैसी ही दुर्बलताएँ हैं । मैं आखिर इसका क्या करूँ ? आग्रही हूं बिना किसी शिलाजीत का ही शालिग्राम बनने का ।

किसी बाबा बंगाली के न मिल सकने के कारण ही आज एक नामधारी ' बाबा विजयेंद्र ' हो गया हूँ । इस झोले में शाम के खाने का आटा है । कोई डेटा नही । बस इस झोले में झांकते जीवन के खुरदरे और जर्जर सपनों के अहसास भर हैं  !

मेरा कोई भी डेटा 'जैविक या ऑर्गेनिक' नही हो सकता है । जो कुछ होगा वह सिंथेटिक, निश्तेज और निष्प्राण ही होगा । कौन जानता है मुझे । मैं अपने को ही नही समझ पाया तो दुनिया क्या मुझे खाक समझेगी ?

बस, कुछ ही गलियां हैं जहां के कुत्ते मुझे देख नही भोंकते ? अनजान गलियों को मैं जानता भी नही जहां मुझे जाना नही है । जहां जाना ही नही हो , उसका क्या अड्रेस पूछना ?

कथित तौर पर मेरा कुछ लिखना, बोलना और करना , मेरे जीवन का खुदरा-व्यापार ही रहा है । खुदरा भी नही वल्कि एक ठीया , जिसको ठिकाना भी नही कह सकते ? यह सत्य है कि सारी उपलब्धियां भौतिक ही होती हैं । यह कभी भी अभौतिक और विद्यमान नही सकती ।

मैं तो 'अ'भाव में ही रहा । जन्म के साथ ही मैं दुर्भाग्य से दीक्षा ले लिया था । मेरे पास कोई 'भाव' नही है । जो कुछ है, वह है केवल बाजार की भाषा और उसकी भंगिमा । मैं अपने जीवन को आजतक केवल 'भाषा' ही दे पाया,  कोई भाव नही । परिभाषा और प्रभाव और मेरे जीवन के भाव ?  इस जीवन से इसका क्या नाता ?

भौतिक और अभौतिक होते-होते मैं भूत हो गया हूं। मैं वर्तमान की सम्पूर्णता में जी नही पाया । हर पल मैं यूँ ही बीतता रहा, व्यतीत होता रहा । बालबोध के कारण वे कंचे , आज भी कंचन ही नजर आते हैं । काश! आज के ये कंचन भी कंचे हो जाते ?

समय क्या है और यह क्या बिता पायेगा मुझे ? मैं स्वयं बीत गया हूँ । यह बीतराग के सिवाय और क्या है ? काल निष्कलंक है । मेरा यह बजबजाता और बासी वर्तमान मेरे अतीत की ही अभिव्यक्ति भर है । बहुआयामी होने की कोशिश ने मझे बहुरूपिया बना दिया । बाजार में 'काली-गोरी' बन घूमता रहा, लाल-पीले कॉस्ट्यूम्स लगाए । मैं क्या करता ? अपनी ही व्यथा की कथा लिखता रहा ।

रंग-रोगन, चाक्य-चिक्य ? ये सब बिस्तर के ही तो विस्तार हैं ? जीवन एक 'ब्रेड और बेड' का संघर्ष ही तो है। कोई भी 'बायो-डेटा' इस बिस्तर के संघर्षों का ही रोजनामचा होता है। बिस्तर जिनके तंग रह गए और जिनके खोते और खाते में कम कद्रदान ही आ पाए, उनके डेटा कहाँ  बन पाते। वे ऐसे जीते रहे कि कभी मरेंगे नही और ऐसे मरते रहे कि वे कभी जीये नही । मैं भी शेष हूं समाप्त होने के लिए।  भागफल जीरो बटा सन्नाटा ।

यह दुनिया भी मिल जाये तो क्या हो? बायो डेटा, विजिटिंग-कार्ड, लेटर-हेड और दफ्तर की नाचती कुर्सियों में मुझे अब जीवन नही दिखता । जो प्रदीप्त है उसे प्रमोशन की क्या जरूरत । भीतर का अंधेरा मिट रहा है । दीपक की लौ तेज हो रही है । छवि क्या बनाऊं । छवि भी तो निषेध से ही बनती है । यह कभी विधायक नही होती ?

गांधी और भगत सिंह को नेमप्लेट और विजिट-कार्ड की क्या जरूरत ? असली जीवन का पता तो यही होता है । जो जितने दिव्यांग हैं उनके नेमप्लेट उतने ही बड़े हैं ।  विचार में दम हो तो उसे प्रचार की क्या जरूरत ? उसे तो कोई भी ले उड़ेगा ।

सेल्फी तो सेल्फिस घराने के शब्द हैं । मरा हुआ किरदार , बेदम लोग, बुझे हुए लोग ही सेल्फी लेते हैं । मरा हुआ व्यक्ति ही किसी दूसरे के फोटो का सहारा लेते हैं । सूर्य कभी सेल्फी नही लेता ! वह सेल्फडिफाइंड है।

आओ ! एक कतरा रोशनी हम स्वयं पैदा करें । हर सुबह जीवन की नई सुबह हो । जो शाम हो गईं उसके प्रति सम्मान से भरें। सुबह का स्वागत करें। जाने वाले कल के प्रति जज़्बाती न हों। जंग जारी हैं । मोर्चे बहुत हैं । उस पार न जाने क्या होगा ?

अफ़सोस ?

दुनिया के इतिहास में किसने सबसे ज़्यादा हत्या की हैं?
1- हिटलर।
आप जानते हैं वह कौन था?
वे ईसाई था, लेकिन मीडिया ने कभी उसे ईसाई आतंकवादी नहीं कहा।
2. स्टालिन।
उसने बीस लाख (एक लाख -दस लाख के बराबर) इंसानों को मौत के घाट उतारा, जिसमें से साढ़े चौदह लाख भूख से मरे। क्या वे मुस्लिम था?
3. मावज़े तंग।
उसने बीस लाख मनुष्यों को मारा।
क्या वे मुस्लिम था?
4. मुसोलिनी।
चार लाख मनुष्यों का हत्यारा है क्या वह मुस्लिम था?
5. अशोका।
उसने हत्या की युद्ध में एक लाख मानव मारे।
क्या वे मुस्लिम था?
6-जॉर्ज बुश के वाणिज्यिक प्रतिबंध के कारण केवल इराक में पांच लाख बच्चे मरे।
उन्हें मीडिया कभी आतंकवादी नही कहता ।
आजकल जिहाद शब्द सुनकर गैर मुस्लिम चिंतित हो जाते हैं जबकि जिहाद का मतलब मासूमों को मारना नही, बल्कि बुराई के खिलाफ और न्याय प्राप्त की कोशिश का नाम जिहाद है।
कुछ और तथ्य:
1- प्रथम विश्वयुद्ध में 17 लाख लोग मारे गए और युद्ध के कारण गैर मुस्लिम थे।
2-द्वितीय विश्व युद्ध में 50-55 लाख लोग मारे गए और कारण? गैर मुस्लिम।
3-नागासाकी पर परमाणु हमले में 2 लाख लोग मरे और उसका कारण? गैर मुस्लिम
4. वियतनाम युद्ध में 500000 मौतों का कारण भी गैर मुस्लिम।
5-बोस्नियाई युद्ध में भी पांच लाख मौतें हुईं कारण। गैर मुस्लिम।
6-इराक युद्ध में अब तक एक करोड़ बीस लाख मौतों का कारण भी गैर मुस्लिम।
7-अफगानिस्तान। फिलिस्तीन और बर्मा में गृहयुद्ध के कारण? ग़ैर मुस्लिम
8-कंबोडिया में लगभग 300,000 मौतों का कारण भी गैर मुस्लिम।
सारांश यह कि:
कोई आतंकवादी मुसलमान नहीं।
और कोई मुसलमान आतंकवादी नही।
और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बड़े विनाश वाले किसी भी हथियार के आविष्कारक मुसलमान नही।
और आज कथित आतंकवादियों के हाथ में जो हथियार हैं वह किसी "इस्लामी फैक्टरी" में नही बने।
आतंकवादी फिर भी केवल मुसलमान कहे जाएं ??
और वह इन सबके बावजूद शांति के ठेकेदार ....... अफसोस

Sunday, 30 December 2018

आरक्षण और जाती !

पहले जाति आई , बाद में आरक्षण आया. आरक्षण ख़त्म होने से जाति ख़त्म नहीं होगी. लेकिन जाति ख़त्म होने से आरक्षण ख़त्म हो जायेगा.

तो फिर सवर्णों का संगठित विरोध जाति-प्रथा के उन्मूलन के लिए क्यों नहीं दिखता है ? क्या वो नहीं चाहते कि आरक्षण की मूल जड़ ही समाप्त हो जाए ?  जाति से उपजी सामाजिक गैर-बराबरी खत्म हो जाए ?

इनका विरोध महज़ आरक्षण को लेकर ही क्यों रहता है ?

सवाल और भी है ....

आरक्षण लागू होने के बाद सवर्णों ने जाति-प्रथा के उन्मूलन के लिए कितने बड़े आन्दोलन किये हैं ? वो कितनी बार भारी संख्या में सड़क पर उतरे हैं ?

ऐसे आन्दोलन आज भी वंचित वर्ग तक ही क्यों सीमित हैं ?

आरक्षण-विरोधी आन्दोलन तो सवर्णों द्वारा प्रायः देश के किसी न किसी हिस्से में देखने को मिल जाता है लेकिन जाति-प्रथा के विरोध में ये कोई बड़ा आन्दोलन क्यों नहीं करते हैं ?

बात बिलकुल साफ़ है. आरक्षण का विरोध घोर जातिवादी और जाति-व्यवस्था को बनाए रखने में यकीन करने वाले लोग ही करते हैं क्योंकि जाति उनके हित में है. यह व्यवस्था उनकी स्वघोषित सामाजिक  श्रेष्ठता को बनाए रखने वाली है. अपने कर्म से ज्यादा कथित जातीय श्रेष्ठता से इन्हें संबल मिलता है.

ये समाप्त हो गयी तो इनकी जातीय श्रेष्ठता भी समाप्त हो जाएगी. इनकी वह रीढ़ टूट जायेगी , जिसके दम पर ये मेरिट और श्रेष्ठता का दावा कर उछलकूद करते रहते हैं. इसीलिए ये इसको बनाए रखने के लिए खुले या छिपे तौर पर हर सम्भव प्रयास करते हैं.

आरक्षण का विरोध जातिगत कुंठा से भी जुड़ा है जो आज विभिन्न क्षेत्रो में सवर्णों के टूटते हुए वर्चस्व का परिणाम है. आरक्षण ने इनके जातीय दंभ को कुंठा में बदल दिया है. यह इनके लिए नासूर बन गया है जो वंचितों की हर क्षेत्र में बढ़ती भागीदारी के साथ गहराता जा रहा है. ऐसे में कथित जातिगत श्रेष्ठता ही इनकी कुंठा को कुछ कम कर पाती है. इन्हें वो साहस दे पाती है जिससे ये अपने से श्रेष्ठ वंचित वर्ग के व्यक्ति के सामने भी अकड़ दिखा पाते हैं. ये इनके लिए घावों पर क्षणिक आराम देने वाले मरहम की तरह काम करती है. ये इनका एनर्जी बूस्टर है. अगर जाति-प्रथा हो समाप्त हो गयी तो इनका कामचलाऊ मरहम तो छिन ही जाएगा साथ ही इनके घावों पर भी  नमक-मिर्च लग जायेगी. ये सुस्त पड़ जाएंगे.

इसके अलावा , ये जानते हैं कि जाति ख़त्म होने का मतलब होगा एक दलित, पिछड़े या आदिवासी के घर से रोटी-बेटी का सम्बन्ध बनाना.

ये जानते है कि जाति ख़त्म होने का मतलब होगा धार्मिक संस्थाओं में सबकी बराबर भागीदारी होना.

ये जानते हैं कि जाति ख़त्म होने का मतलब होगा  जमीन-जायदाद में सभी को समान रूप से भागीदार  बनाना.

ये जानते हैं कि जाति ख़त्म होने का मतलब होगा हर उस क्षेत्र में समान भागीदारी , जहां सदियों से इनका कब्ज़ा है.

ये यह भी जानते हैं कि आज के दौर में नाम के बाद तिवारी , चौबे , दूबे , छब्बे हटाने का कोई मतलब नहीं है . ये सब महज़ प्रगतिशीलता के नाम पर ढोंग करना है और छिपे तौर पर अपने जातिवादी अजेंडे को आगे बढ़ाना है.

ये जानते है कि जाति के नाम पर मौन रहना ही श्रेयस्कर है. इसके विरोध में लिखने बोलने की जिम्मेदारी इनकी नहीं सिर्फ वंचितों की है.

ये जानते हैं कि आरक्षण विरोधियो को छुप कर समर्थन करना और लोगो के सामने प्रगतिशील बनना कितना जरुरी है.

ये जानते हैं कि आरक्षण की युवाओ के दिमाग में नकारात्मक छवि बनाना कितना जरुरी है. इसके लिए चाहे आरक्षण को अन्यायपूर्ण व्यवस्था कहना पड़े या समान शिक्षा और आर्थिक समानता के बरक्स उसे बेकार दिखाना पड़े , ये दोनों के पक्ष में तर्क गढ़ते हैं.

ये जानते हैं कि फरेब और मक्कारी की सारी हदे पार करना कितना जरुरी है.

ये वो सब जानते हैं जिसे आप प्रायः नहीं समझ पाते या जिस पर ध्यान नहीं देते हैं.

इसीलिए ये जाति-प्रथा का विरोध नहीं करते हैं. इनकी कुंठित खोपड़ी में जाति समाप्त करने की बजाय आरक्षण समाप्त करने के नए-नए फार्मूले इजाद होते रहते हैं. इनके दिमाग की सारी उर्वरता अन्याय और असमानता कायम करने वाली ज़मीन पर ही फलित होती है. इन्हें समझना मुश्किल नहीं है. बस वहां से सोचना शुरू करिये जहां इनकी सोच खत्म होती है.

डर...

अखबारों ने बताया,टीवी पर सुना है, डरने लगे हैं आप हिंदुस्तान में, ये कैसा डर है... 130 करोड़ के देश के प्रधानमंत्री को गालियां देते हुए, ...