Monday, 31 December 2018

" एक्सिडेंटल प्राईम मिनिस्टर "

मै_अनुपम_खेर_जी_की_फ़िल्म_जरूर_देखूंगा

मै देखना चाहूंगा डॉ मनमोहन सिंह साहब ने वैश्विक मंदी होने के बावजूद देश के किसानों का 80000 करोड़ कर्ज माफ करके भी देश की अर्थव्यवस्था को कैसे मजबूत रखा....!

मै यह देखना चाहूँगा की MnREGa जैसी योजना चलाकर 9 साल में 7 करोड़ लोगों की गरीबी रेखा से ऊपर कैसे किया..!

मै यह देखना चाहूँगा की ज्योर्ज बुश को अपने ही देश मे न्यूक्लियर डील पर ऊनकी शर्तों का ना मंजूर करनेका 56'' का सीना डॉ मनमोहन सिंह साहब का..!

मै यह देखना चाहूँगा कश्मीर में शांति कैसे बनाई रखी थी डॉ मनमोहन सिंह साहब ने..!

मै यह देखना चाहूँगा देश कसाब / अफजल को फाँसी चढ़ाएं जाने का मजबूत फैसला कैसे लिया सिंह साहब ने..!

8 सर्जिकल स्ट्राइक करने के बाद भी एक बार भी यह कहकर वोट नही मांगने का जिगर मनमोहन सिंह साहब का..!

मंगलयान छोड़कर अमरीका रशिया चाइना को जवाब दिया उसके बाद मनमोहन सिंह साहब अभिमानी क्यो नही हुवे ..!!

वो लेटर भी देखना चाहूँगा जो पाकिस्तान को मिलने पर पाकिस्तान ने सेना को वापस बुला लिया था..!!

डॉकलाम में युद्ध पोतक जहाज हरक्यूलिस उतारकर डॉ मनमोहन सिंह साहब ने देश को यह क्यों नही बताया कि उन्होंने चाइना को लाल आंखे दिखाई..?

युवाओं को बेरोजगार होने से कैसे बचाया ??

देश को दुनिया की 3rd बड़ी अर्थव्यवस्था कैसे बनाया ??

JNnurm योजना में हर शहर के विकास का ध्यान रखा कभी भाजपा की तरह पक्षपात करने का क्यो नही सोचा ??

विश्व प्रसिद्ध दिल्ही एयरपोर्ट बनाकर भी क्रेडिट क्यो नही लिया ??

RTI मजबूत करने का इरादा कैसे लिया था..?

लड़ाकू विमान तेजस , आईएनएस विशाल , आईएनएस कावेरी , स्कॉर्पिन पनडुब्बी देश मे निर्मित करने का भरोसा कहा से लेकर आये थे ..??

मै यह देखना चाहूंगा FDI के विरोध में सुषमा बुआ का डांस कैसा था..!

वो आधार कार्ड , FDI , GST का विरोध करने वाले CM मोदी का रोल कोंन कर रहा है..!

ऐसे कई काम है जो में देखना चाहूँगा... मगर फ़िल्म में वही पुराने घोटाले का आरोप बताकर... जो आजतक साबित नही हुवे सुप्रीम कोर्ट ने यह आरोप सिर्फ सरकार को बदनाम करने के लिए है कह कर अपने निर्णय बता दिए है...अगर फ़िल्म में वही आरोप बताकर डॉ मनमोहन सिंह साहब को मजबूर बताने का इरादा है तो ये फिल्म झुटी है !

बायोडाटा 😕😋

मैं बायोडेटा नही हूँ .....
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क्यों और क्या दूँ मैं किसी को अपना बायो-डेटा ?  इसमें है ही क्या ? सच तो यही है कि मेरे द्वारा जीवन की कोई त्रिज्या खींची ही नही जा सकी, जिससे कोई परिधि भी बनती और उसमें स्वयं के होने की कोई सूचना भी होती ? 

मेरी मूर्खता और मूढ़ता के विस्तार को कोई 'व्यक्तित्व' कह देने की भूल न करें । आज बहुतों के पास वीरताजन्य उपलब्धियां हैं, और होनी भी चाहिए ? मेरे तो पास स्खलित 'शौर्य-पात' जैसी ही दुर्बलताएँ हैं । मैं आखिर इसका क्या करूँ ? आग्रही हूं बिना किसी शिलाजीत का ही शालिग्राम बनने का ।

किसी बाबा बंगाली के न मिल सकने के कारण ही आज एक नामधारी ' बाबा विजयेंद्र ' हो गया हूँ । इस झोले में शाम के खाने का आटा है । कोई डेटा नही । बस इस झोले में झांकते जीवन के खुरदरे और जर्जर सपनों के अहसास भर हैं  !

मेरा कोई भी डेटा 'जैविक या ऑर्गेनिक' नही हो सकता है । जो कुछ होगा वह सिंथेटिक, निश्तेज और निष्प्राण ही होगा । कौन जानता है मुझे । मैं अपने को ही नही समझ पाया तो दुनिया क्या मुझे खाक समझेगी ?

बस, कुछ ही गलियां हैं जहां के कुत्ते मुझे देख नही भोंकते ? अनजान गलियों को मैं जानता भी नही जहां मुझे जाना नही है । जहां जाना ही नही हो , उसका क्या अड्रेस पूछना ?

कथित तौर पर मेरा कुछ लिखना, बोलना और करना , मेरे जीवन का खुदरा-व्यापार ही रहा है । खुदरा भी नही वल्कि एक ठीया , जिसको ठिकाना भी नही कह सकते ? यह सत्य है कि सारी उपलब्धियां भौतिक ही होती हैं । यह कभी भी अभौतिक और विद्यमान नही सकती ।

मैं तो 'अ'भाव में ही रहा । जन्म के साथ ही मैं दुर्भाग्य से दीक्षा ले लिया था । मेरे पास कोई 'भाव' नही है । जो कुछ है, वह है केवल बाजार की भाषा और उसकी भंगिमा । मैं अपने जीवन को आजतक केवल 'भाषा' ही दे पाया,  कोई भाव नही । परिभाषा और प्रभाव और मेरे जीवन के भाव ?  इस जीवन से इसका क्या नाता ?

भौतिक और अभौतिक होते-होते मैं भूत हो गया हूं। मैं वर्तमान की सम्पूर्णता में जी नही पाया । हर पल मैं यूँ ही बीतता रहा, व्यतीत होता रहा । बालबोध के कारण वे कंचे , आज भी कंचन ही नजर आते हैं । काश! आज के ये कंचन भी कंचे हो जाते ?

समय क्या है और यह क्या बिता पायेगा मुझे ? मैं स्वयं बीत गया हूँ । यह बीतराग के सिवाय और क्या है ? काल निष्कलंक है । मेरा यह बजबजाता और बासी वर्तमान मेरे अतीत की ही अभिव्यक्ति भर है । बहुआयामी होने की कोशिश ने मझे बहुरूपिया बना दिया । बाजार में 'काली-गोरी' बन घूमता रहा, लाल-पीले कॉस्ट्यूम्स लगाए । मैं क्या करता ? अपनी ही व्यथा की कथा लिखता रहा ।

रंग-रोगन, चाक्य-चिक्य ? ये सब बिस्तर के ही तो विस्तार हैं ? जीवन एक 'ब्रेड और बेड' का संघर्ष ही तो है। कोई भी 'बायो-डेटा' इस बिस्तर के संघर्षों का ही रोजनामचा होता है। बिस्तर जिनके तंग रह गए और जिनके खोते और खाते में कम कद्रदान ही आ पाए, उनके डेटा कहाँ  बन पाते। वे ऐसे जीते रहे कि कभी मरेंगे नही और ऐसे मरते रहे कि वे कभी जीये नही । मैं भी शेष हूं समाप्त होने के लिए।  भागफल जीरो बटा सन्नाटा ।

यह दुनिया भी मिल जाये तो क्या हो? बायो डेटा, विजिटिंग-कार्ड, लेटर-हेड और दफ्तर की नाचती कुर्सियों में मुझे अब जीवन नही दिखता । जो प्रदीप्त है उसे प्रमोशन की क्या जरूरत । भीतर का अंधेरा मिट रहा है । दीपक की लौ तेज हो रही है । छवि क्या बनाऊं । छवि भी तो निषेध से ही बनती है । यह कभी विधायक नही होती ?

गांधी और भगत सिंह को नेमप्लेट और विजिट-कार्ड की क्या जरूरत ? असली जीवन का पता तो यही होता है । जो जितने दिव्यांग हैं उनके नेमप्लेट उतने ही बड़े हैं ।  विचार में दम हो तो उसे प्रचार की क्या जरूरत ? उसे तो कोई भी ले उड़ेगा ।

सेल्फी तो सेल्फिस घराने के शब्द हैं । मरा हुआ किरदार , बेदम लोग, बुझे हुए लोग ही सेल्फी लेते हैं । मरा हुआ व्यक्ति ही किसी दूसरे के फोटो का सहारा लेते हैं । सूर्य कभी सेल्फी नही लेता ! वह सेल्फडिफाइंड है।

आओ ! एक कतरा रोशनी हम स्वयं पैदा करें । हर सुबह जीवन की नई सुबह हो । जो शाम हो गईं उसके प्रति सम्मान से भरें। सुबह का स्वागत करें। जाने वाले कल के प्रति जज़्बाती न हों। जंग जारी हैं । मोर्चे बहुत हैं । उस पार न जाने क्या होगा ?

अफ़सोस ?

दुनिया के इतिहास में किसने सबसे ज़्यादा हत्या की हैं?
1- हिटलर।
आप जानते हैं वह कौन था?
वे ईसाई था, लेकिन मीडिया ने कभी उसे ईसाई आतंकवादी नहीं कहा।
2. स्टालिन।
उसने बीस लाख (एक लाख -दस लाख के बराबर) इंसानों को मौत के घाट उतारा, जिसमें से साढ़े चौदह लाख भूख से मरे। क्या वे मुस्लिम था?
3. मावज़े तंग।
उसने बीस लाख मनुष्यों को मारा।
क्या वे मुस्लिम था?
4. मुसोलिनी।
चार लाख मनुष्यों का हत्यारा है क्या वह मुस्लिम था?
5. अशोका।
उसने हत्या की युद्ध में एक लाख मानव मारे।
क्या वे मुस्लिम था?
6-जॉर्ज बुश के वाणिज्यिक प्रतिबंध के कारण केवल इराक में पांच लाख बच्चे मरे।
उन्हें मीडिया कभी आतंकवादी नही कहता ।
आजकल जिहाद शब्द सुनकर गैर मुस्लिम चिंतित हो जाते हैं जबकि जिहाद का मतलब मासूमों को मारना नही, बल्कि बुराई के खिलाफ और न्याय प्राप्त की कोशिश का नाम जिहाद है।
कुछ और तथ्य:
1- प्रथम विश्वयुद्ध में 17 लाख लोग मारे गए और युद्ध के कारण गैर मुस्लिम थे।
2-द्वितीय विश्व युद्ध में 50-55 लाख लोग मारे गए और कारण? गैर मुस्लिम।
3-नागासाकी पर परमाणु हमले में 2 लाख लोग मरे और उसका कारण? गैर मुस्लिम
4. वियतनाम युद्ध में 500000 मौतों का कारण भी गैर मुस्लिम।
5-बोस्नियाई युद्ध में भी पांच लाख मौतें हुईं कारण। गैर मुस्लिम।
6-इराक युद्ध में अब तक एक करोड़ बीस लाख मौतों का कारण भी गैर मुस्लिम।
7-अफगानिस्तान। फिलिस्तीन और बर्मा में गृहयुद्ध के कारण? ग़ैर मुस्लिम
8-कंबोडिया में लगभग 300,000 मौतों का कारण भी गैर मुस्लिम।
सारांश यह कि:
कोई आतंकवादी मुसलमान नहीं।
और कोई मुसलमान आतंकवादी नही।
और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बड़े विनाश वाले किसी भी हथियार के आविष्कारक मुसलमान नही।
और आज कथित आतंकवादियों के हाथ में जो हथियार हैं वह किसी "इस्लामी फैक्टरी" में नही बने।
आतंकवादी फिर भी केवल मुसलमान कहे जाएं ??
और वह इन सबके बावजूद शांति के ठेकेदार ....... अफसोस

Sunday, 30 December 2018

आरक्षण और जाती !

पहले जाति आई , बाद में आरक्षण आया. आरक्षण ख़त्म होने से जाति ख़त्म नहीं होगी. लेकिन जाति ख़त्म होने से आरक्षण ख़त्म हो जायेगा.

तो फिर सवर्णों का संगठित विरोध जाति-प्रथा के उन्मूलन के लिए क्यों नहीं दिखता है ? क्या वो नहीं चाहते कि आरक्षण की मूल जड़ ही समाप्त हो जाए ?  जाति से उपजी सामाजिक गैर-बराबरी खत्म हो जाए ?

इनका विरोध महज़ आरक्षण को लेकर ही क्यों रहता है ?

सवाल और भी है ....

आरक्षण लागू होने के बाद सवर्णों ने जाति-प्रथा के उन्मूलन के लिए कितने बड़े आन्दोलन किये हैं ? वो कितनी बार भारी संख्या में सड़क पर उतरे हैं ?

ऐसे आन्दोलन आज भी वंचित वर्ग तक ही क्यों सीमित हैं ?

आरक्षण-विरोधी आन्दोलन तो सवर्णों द्वारा प्रायः देश के किसी न किसी हिस्से में देखने को मिल जाता है लेकिन जाति-प्रथा के विरोध में ये कोई बड़ा आन्दोलन क्यों नहीं करते हैं ?

बात बिलकुल साफ़ है. आरक्षण का विरोध घोर जातिवादी और जाति-व्यवस्था को बनाए रखने में यकीन करने वाले लोग ही करते हैं क्योंकि जाति उनके हित में है. यह व्यवस्था उनकी स्वघोषित सामाजिक  श्रेष्ठता को बनाए रखने वाली है. अपने कर्म से ज्यादा कथित जातीय श्रेष्ठता से इन्हें संबल मिलता है.

ये समाप्त हो गयी तो इनकी जातीय श्रेष्ठता भी समाप्त हो जाएगी. इनकी वह रीढ़ टूट जायेगी , जिसके दम पर ये मेरिट और श्रेष्ठता का दावा कर उछलकूद करते रहते हैं. इसीलिए ये इसको बनाए रखने के लिए खुले या छिपे तौर पर हर सम्भव प्रयास करते हैं.

आरक्षण का विरोध जातिगत कुंठा से भी जुड़ा है जो आज विभिन्न क्षेत्रो में सवर्णों के टूटते हुए वर्चस्व का परिणाम है. आरक्षण ने इनके जातीय दंभ को कुंठा में बदल दिया है. यह इनके लिए नासूर बन गया है जो वंचितों की हर क्षेत्र में बढ़ती भागीदारी के साथ गहराता जा रहा है. ऐसे में कथित जातिगत श्रेष्ठता ही इनकी कुंठा को कुछ कम कर पाती है. इन्हें वो साहस दे पाती है जिससे ये अपने से श्रेष्ठ वंचित वर्ग के व्यक्ति के सामने भी अकड़ दिखा पाते हैं. ये इनके लिए घावों पर क्षणिक आराम देने वाले मरहम की तरह काम करती है. ये इनका एनर्जी बूस्टर है. अगर जाति-प्रथा हो समाप्त हो गयी तो इनका कामचलाऊ मरहम तो छिन ही जाएगा साथ ही इनके घावों पर भी  नमक-मिर्च लग जायेगी. ये सुस्त पड़ जाएंगे.

इसके अलावा , ये जानते हैं कि जाति ख़त्म होने का मतलब होगा एक दलित, पिछड़े या आदिवासी के घर से रोटी-बेटी का सम्बन्ध बनाना.

ये जानते है कि जाति ख़त्म होने का मतलब होगा धार्मिक संस्थाओं में सबकी बराबर भागीदारी होना.

ये जानते हैं कि जाति ख़त्म होने का मतलब होगा  जमीन-जायदाद में सभी को समान रूप से भागीदार  बनाना.

ये जानते हैं कि जाति ख़त्म होने का मतलब होगा हर उस क्षेत्र में समान भागीदारी , जहां सदियों से इनका कब्ज़ा है.

ये यह भी जानते हैं कि आज के दौर में नाम के बाद तिवारी , चौबे , दूबे , छब्बे हटाने का कोई मतलब नहीं है . ये सब महज़ प्रगतिशीलता के नाम पर ढोंग करना है और छिपे तौर पर अपने जातिवादी अजेंडे को आगे बढ़ाना है.

ये जानते है कि जाति के नाम पर मौन रहना ही श्रेयस्कर है. इसके विरोध में लिखने बोलने की जिम्मेदारी इनकी नहीं सिर्फ वंचितों की है.

ये जानते हैं कि आरक्षण विरोधियो को छुप कर समर्थन करना और लोगो के सामने प्रगतिशील बनना कितना जरुरी है.

ये जानते हैं कि आरक्षण की युवाओ के दिमाग में नकारात्मक छवि बनाना कितना जरुरी है. इसके लिए चाहे आरक्षण को अन्यायपूर्ण व्यवस्था कहना पड़े या समान शिक्षा और आर्थिक समानता के बरक्स उसे बेकार दिखाना पड़े , ये दोनों के पक्ष में तर्क गढ़ते हैं.

ये जानते हैं कि फरेब और मक्कारी की सारी हदे पार करना कितना जरुरी है.

ये वो सब जानते हैं जिसे आप प्रायः नहीं समझ पाते या जिस पर ध्यान नहीं देते हैं.

इसीलिए ये जाति-प्रथा का विरोध नहीं करते हैं. इनकी कुंठित खोपड़ी में जाति समाप्त करने की बजाय आरक्षण समाप्त करने के नए-नए फार्मूले इजाद होते रहते हैं. इनके दिमाग की सारी उर्वरता अन्याय और असमानता कायम करने वाली ज़मीन पर ही फलित होती है. इन्हें समझना मुश्किल नहीं है. बस वहां से सोचना शुरू करिये जहां इनकी सोच खत्म होती है.

Saturday, 29 December 2018

असलियत बनाम हिन्दू !!!

*हिंदू-हिंदू सब कहे। हिंदू को जाने ना कोय।।*
*जो हिंदू का सच जाने।तो हिंदू माने ना कोय।।*

*"मनुस्मृति यानि मनुविधान यानि ब्राह्मणों का संविधान" के अनुसार हिन्दू राष्ट्र का मतलब समझने का कष्ट करें

*ब्राह्मण (पंडित) धर्म के नाम पर भरपूर मौज करेगा।

*क्षत्रिय (राजपूत) धर्म के नाम पर जमकर दादागिरी करेगा।

*वैश्य (बणिया) धर्म के नाम पर जबरदस्त धन की लुट मचाएगा।

*शूद्र (ओबीसी)  धर्म के नाम पर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यों की सेवा करेंगे, यानि उनके लिए खाना बनाएंगे, उनके घरों में पोछा लगाएंगे, उनके कपड़ें धोएंगे, उनके झूठे बर्तन धोएंगे, उनके हाथ-पैर दबाएंगे, उनके हाथ-पैरों की मालिश करेंगे, अपनी बेटियों को मंदिरों में जीवनभर के लिए दान देंगे, अपनी महिलाओं की अस्मत ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यों से बचा नहीं पाएंगे, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यों के सामने नजरें झुकाकर ही रहेंगे। इनके लिए शिक्षा का कोई अधिकार नहीं होगा।

*अछूत (एससी) धर्म के नाम पर बेगारी करेंगे, सिर पर मैला ढोएंगे, मृत पशु उठाएंगे, मार खाएंगे, गांव-शहर के बाहर झौपड़ियों में रहेंगे, गले में हांडी बांधेंगे, कमर पर झाड़ू बांधेंगे, सिर्फ झूठन ही खाएंगे, सिर्फ गंदी नाली का पानी ही पिएंगे, सिर्फ गंदे-फटे कपड़ें ही पहनेंगे, सिर्फ दोपहर में ही खांसते हुए निकलेंगे, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यों के घरों के सामने से जूतें-चप्पल सिर पर रखकर व चेहरा ढककर निकलेंगे। इनको भी शिक्षा का अधिकार नहीं होगा।

*आदिवासी (एसटी) सिर्फ जंगल में ही रहेंगे, जंगली जीवन ही जिएंगे, जंगली वस्तुएं ही खाएंगे, जंगल से बाहर नहीं निकलेंगे, गांव-शहर की सुविधाओं से वंचित रहेंगे। इनको भी शिक्षा का अधिकार नहीं होगा।

*अल्पसंख्यक (मुस्लिम-ईसाई) देश में इनकी कोई अहमियत नहीं होगी, गुलाम बनकर रहेंगे, अत्याचार सहेंगे, अत्याचारों का विरोध नहीं करेंगे। इनको भी शिक्षा का अधिकार नहीं होगा।

*विशेष आरएसएस प्रमुख मोहनभागवत, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती, गृहमंत्री राजनाथसिंह, कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद, केंद्रीय मंत्री अनंतकुमार हेगड़े, सांसद सुब्रमण्यम स्वामी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, यूपी का मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, एमपी का मुख्यमंत्री शिवराजसिंह, हरियाणा का मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर, गुजरात का मुख्यमंत्री पटेल, महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री फड़नवीस, छत्तीसगढ़ का मुख्यमंत्री रमणसिंह, गोवा का मुख्यमंत्री मनोहर पणिकर, राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, श्रीश्री रविशंकर, बाबा रामदेव, जैन मुनि तरूण सागर आदि हिंदू राष्ट्र के कट्टर समर्थक है....

खासतौर पर भारत के बहुजन समाज के मूलनिवासियों एससी, एसटी, ओबीसी, अल्पसंख्यकों को हिंदू राष्ट्र का समर्थन करने से पहले यह सच्चाई जान लेनी चाहिए कि गलतफहमी में आपके समर्थन से आप ही गुलाम ना बन जाएं।

*इसके आगे अब आपको सोचना, विचारना, समझना और चिंतन करना है कि आपको हिंदू राष्ट्र चाहिए या समतामूलक समाज आधारित मानवतावादी प्रजातांत्रिक राष्ट्र भारत चाहिए....*

क्या भारत मे वाकई डर लगता है ?🤔

जिनको भारत में अब डर नहीं लगता है वे यह प्रयोग करके देखें और फिर सोचें ——

१- अपने परिवार की किसी भी बच्ची, युवती, स्त्री को अकेले कहीं भी भेज दें।एक छोटा आडियो या वीडियो रिकार्डर साथ में छुपा दें और इतनी दूर रहे कि आपात्काल में रेस्क्यू कर सकें, कुछ घंटें बाद जो हो वह शेयर ज़रूर करें शर्मायें नहीं। अनुपम खेर यदि चाहें तो श्रीमती किरनखेर सांसद को बग़ैर सुरंक्षा के यूपी बिहार मप्र हरियाणा में यह प्रयोग कर सकते हैं

२- नक़ली दाढ़ी और स्कल टोपी लगाकर दो तीन लोग चार छ: गायों के साथ सिर्फ़ एक दिन की पैदल यात्रा या खुले छोटे ट्रक में उत्तरभारत में घूमने निकल जाये। अपनी हिंदू आईडी ज़रूर साथ रखें । हो सके तो उचित संख्या में स्थानीय पुलिस और एक टीवी चैनल को समुचित दूरी बनाकर चलें । अनुपम खेर अच्छे अभिनेता है , सरदार मनमोहन सिंह के वेश में अभिनय कर चुके हैं ।दाड़ी और खल्वाट खोपड़ी में सही जंचेंगें। 

३— अनुपम खेर के शहर बंबई में ही मुसलमान नाम से ग़ैर मुस्लिम बस्ती कालोनियाँ में कोई घर किराये पर लेकर दिखा दे जहाँ आपको कोई जानता न हो।

४—- ३०-४० लोग इस्लाम का हरा झंडा लेकर बग़ैर कोई नारा लगाये  हिंदू बस्तियों में सिर्फ़ घूमने निकल जायें और प्रतिक्रियाओं को दर्ज करते रहें।

शाम को लौट कर यदि सिहरन नहीं हो रही हो तो ज़रूर कहें कि भारत में डर नहीं लगता।
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नोट- किसी भी अप्रिय या हिंसक घटना होने पर मेरी कोई ज़िम्मेदारी नहीं है , ख़ुद के जोखिम पर ही ये प्रयोग करें।

एक और नोट— ८०% से ज़्यादा बहुसंख्य हिंदू अपने अपने सुरक्षित “क़िलों " में बैठकर नसीरुद्दीन शाह और वक्त बेवक्त शाहरुख खान, आमिर खान जैसे फिल्मी व्यवसाइयों को पाकिस्तानी बताकर अपना जनम  सफल कर सकते है. बाबारामदेव जैसे व्यापारी को सरकारी जैड सुरक्षा लेने का कारण क्या है ? ऐसे हिंदू हृदयसम्राटों की अब लंबी सूची है जो भारीभरकम सुरक्षा बंदोबस्त में चल रहे हैं , क्यों ? भारत में किससे डर लगता है ?
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आखिर कौन डरपोक 🤔🤔🤔

जिनका सारा खेल ही "डर" पर टिका हो वो गुस्सा हैं कि फ़लाना डर क्यूं रहा है.. जिनकी सारी नीति और ध्येय ही यही था और है कि एक विशिष्ट समुदाय को डरा कर रखा जाय.. वो कह रहे हैं भाई डर क्यूं रहे हो?
दिन रात एक कर दिया इन्होंने अपने बहुसंख्यक समुदाय को डराने में
एक काम कीजिये.. आप अपने किसी भी रैंडम मित्र का मोबाइल उठा के व्हाट्सएप्प चेक कर लीजिए… जो डरने वाले बॉलीवुड के "अरबी" नाम के व्यक्ति को कोस रहे हैं उन्हीं की व्हाट्सएप्प हिस्ट्री में आपको एक दो दिन पहले के ही ऐसे मैसेज मिलेंगे "पाकिस्तान से आज़ाद होकर आया हामिद अंसारी और सरबजीत की लाश आयी.. मज़हब नहीं सिखाता आपस मे बैर रखना".. उनसे पूछिये इस मैसेज से वो किसे डरा रहे हैं?
जब भाजपा नेता अपने हर भाषणो में ये बताते हैं कि "ये हुवा तो पाकिस्तान में पटाख़े फूटेंगे" तो दरअसल भाजपा नेता किसे डरा रहे होते है? भाजपा के नेताजी क्यूं राज कर रहे हैं बताईये? इसीलिए ही तो क्यूंकि आप को डर है कि ये ना हुवे तो आपका क्या होगा.. आप ही के पास दिन रात मैसेज आता है कि "भाजपा के नेताजी हार गए तो उनका क्या होगा ये ना सोचो, ये सोचो तुम लोगों का क्या होगा".. और ये मैसेज आप ख़ूब धड़ल्ले से फारवर्ड करते हैं.. किस से डर रहे हो और किसे डराते हो ऐसे मैसेज फारवर्ड कर के??
ये सीने के नाप छप्पन इंची और बासठ इंची क्यूं बताते हो मंच से? किस फ्री स्टाइल कुश्ती में किस पहलवान को डरा रहे हो यहां?
ख़ुद अस्सी करोड़ लोगों को बीस करोड़ से डरा डरा कर आपने डाइपर पहनवा दिया है और वो दिन रात डाइपर पहने घूमते हैं... उनसे कहो कि डरो न प्लीज, डाइपर उतार दो.. तो कहते हैं कि नहीं "तुम लोग मर डालोगे हमे".. उनसे अगर कहो कि "हमारे बाप दादाओं ने कभी किसी को नहीं मारा.. आप अपने घर और उसके आसपास रहने वालों की साठ साल की हिस्ट्री उठा कर देख लीजिए कि किस पड़ोसी ने किस पड़ोसी को धर्म के नाम पर मार डाला".. तो कहते हैं कि "दिन रात हमें  भाजपा संगठन आगाह कर रहा है कि वो आज नहीं तो कल मारेंगे".. उनसे कहो कि “हम अमनपसंद हैं”.. तो कहेंगे कि “हमारा भाजपा संगठन कहता है कि तुम ताक़यिय्या कर रहे हो”.... बताओ.. हमको डराने के चक्कर में आप कितने डरपोक हो गए हो कभी सोचा है?

Sunday, 23 December 2018

" झूठा ही सही "

एक बहुत पुरानी और चर्चित गैर राजनैतिक कहानी।

एक दुकान के बाहर लिखा था कि इन्सानों की तरह बात करने वाला गधा बिकाऊ है..

एक आदमी दुकानदार से जाकर बोला, मैं उस गधे को देखना चाहता हूँ..

दुकानदार ने कहा, 'साथ के कमरे में बैठा है...जा कर मिल लो..

ग्राहक उस कमरे में गया, वहाँ कुर्सी पर एक हट्टा-कट्टा गधा बैठे बैठे...अपनी पुरानी फोटो देख रहा था!

उसने पूछा: 'क्यों भाई, तुम यहां क्या कर रहे हो ??

गधे ने बताया, "कर तो मैं बहुत कुछ सकता हूँ, लेकिन आजकल इस दुकान की चौकीदारी करता हूँ!

इससे पहले अमेरिका के जासूसी महकमे में काम करता था और कई खूंखार आतंकवादियों को पकड़वाया...फिर मैं इंग्लैंड चला गया जहां पुलिस के लिए मुखबरी करता था!

बहरहाल साढ़े चार साल से यहाँ हूँ!

उस आदमी ने दुकानदार से पूछा, मेरे भाई, तुम इतने गुणवान गधे को बेचना क्यों चाहते हैं ??

दुकानदार बोला, मोदीजी की कसम मेरे भाई...
ये अव्वल नम्बर का झूठा है।🙏🙏

डर...

अखबारों ने बताया,टीवी पर सुना है, डरने लगे हैं आप हिंदुस्तान में, ये कैसा डर है... 130 करोड़ के देश के प्रधानमंत्री को गालियां देते हुए, ...