Friday, 22 June 2018

Strategic Thinking __ INDIA

भारतीय जनमानस में सामरिक सोच की कमी रही है।
दूरगामी सोच और रणनीतिक दिशा देश के अस्तित्व के  लिए कितनी  महत्त्वपूर्ण है यह न सोचकर तेल की कीमत,दाल चावल की कीमतों तक ही जनता सोच पाती है।
जिस देश में महाराणा प्रताप जैसे राजा हुए जिन्होंने घास की रोटी भी खाई वो प्याज के मूल्य पर राष्ट्र का मूल्य लगा देते है। 
2014 के बाद से भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में भारत की चेतन कूटनीति और विरोधाभास को केंद्र में रख कर गढ़ी गयी सामरिक नीति इतनी लीक से हट कर रही है कि जहां परंपरागत शत्रु राष्ट्र पाकिस्तान उसमे बुरी तरह उलझ गया है वही चीन उसको गम्भीरता से पढ़ रहा है।
लेकिन इसको लेकर मोदी सरकार की सबसे ज्यादा आलोचना खुद भारत मे हुई है जहां सबसे बड़े आलोचक या उनके विरोधी होते है या फिर हर विषय मे मोदी जी को निर्देश व ज्ञान देने वाले समर्थक होते है।
आज राष्ट्र के पास बहुत से जो प्रश्न है वह भारत को विरासत मिले है।
जैसा की यह चीन को लेकर समस्या।
कश्मीर की समस्या भारत का दुर्भाग्य यह रहा है कि जब चीन डीज़बू, पाकिस्तान, श्रीलंका, म्यांमार के कोको द्वीप में अपने नौसेना व वायुसेना के अड्डे बनाकर और पाकिस्तान में ग्वादर बंदरगाह को सीपेक परियोजना के तहत बनाकर, सीधे सड़क से जोड़ कर, भारत को पर्ल ऑफ स्ट्रिंग की नीति की तहत हिन्द महासागर में घेर रहा था, तब भारत की तत्कालीन यूपीए सरकार अपनी मानसिक दिव्यांगता के कारण इस चीनी कुचक्र को तोड़ने के लिये किसी भी सफल नीति बनाने में असफल रही थी।

ऐसा नही है की भारत मे ऐसे लोग नही थे जिन्हें चीन की विस्तारवादी नीति व उसकी भारत को आर्थिक रूप से अपाहिज करने की योजना का ज्ञान नही था।
        ऐसा भी नही है कि लोगों को चीन द्वारा अपने व्यपारिक व सामरिक हितों की रक्षा के लिये, हिन्द महासागर में बढ़ाई गयी आक्रमकता समझ मे नही आरही थी, लेकिन किन्ही कारणों से यूपीए की सरकार के लिये चीन की बढ़ती आक्रमकता को प्रत्युत्तर देना, उनकी प्राथमिकता में नही थी। इस सब का परिणाम हुआ कि नौसेना से लेकर वायुसेना तक मे भारत नीतिगत रूप से तकनीकी और संख्याबल में पीछे हो गया।
यूपीए काल मे हिन्द महासागर में अपने हितों की रक्षा के लिये कुछ योजनायें व कुछ राष्ट्रों से सन्धियों को लेकर प्रस्ताव भी सामने आये लेकिन रहस्मय ढंग से या तो वे प्रस्ताव से आगे नही बढ़े या फिर उनका सफलतापूर्वक किर्यान्वन नही हुआ।
इसका परिणाम यह हुआ की भारत, चीन से अपनी सुरक्षा और हिन्द महासागर में अपने आर्धिक हितों व सामरिक हितों की रक्षा करने की दिशा में एक दशक पीछे होकर, अतिसंवेदनशील स्थिति में पहुंच चुका था।

तभी 2014 में सत्ता परिवर्तन हुआ और नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार आयी और उसने भारत की रक्षा व सुरक्षा को अपनी प्रथमिकता बनायी। मोदी सरकार ने उसको भारत के आर्थिक हितों से जोड़कर, कूटनीति को अपनी सामरिक नीति का भाग बनाया जिससे चीन के पर्ल ऑफ स्ट्रिंग द्वारा भारत को घेरने के प्रयास को कम समय मे प्रभावी रूप से कुंद किया जासके।

इसी नीति के तहत मोदी जी ने अपने अपने शुरू के दो वर्षों में बड़ी विदेश यात्रायें की और भारत के हितों को केंद्र में रख कर एक नये विश्व व्यवस्था को रुपित किया। हालांकि उनकी इस विदेश यात्रा को लेकर विपक्ष से लेकर समर्थकों तक उनकी काफी आलोचना हुई थी लेकिन आज 4 वर्षो के भीतर, चीन के संदर्भ मोदी जी के प्रयासों के सफल परिणामो की खबरे छन छन कर सामने आने लगी है।

ईरान में भारत द्वारा चाबहार बंदरगाह बनाना इसी नीति का हिस्सा है जिसके बारे में काफी कुछ लिखा भी गया है। चाबहार को लेकर लिखा भी शायद इसी लिये गया है क्योंकि उसका मूलतः उद्देश्य आर्थिक था और ज्यादातर सूचनाये भारत की सरकार द्वारा मनोवैज्ञानिक प्रभाव के लिये सर्वजिनिक की गई थी। इसीके साथ कुछ और भी है जिन्हें पहले सर्वजिनिक नही की गई थी और अब भी उसके बारे में भारत की जनता नही जानती है।

भारत से दूर हिन्द महासागर में एक और भारत है जो 3915 किमी दूर सैशेल्स में है। वहां के एसम्पशन द्वीप, जो 11.60 वर्ग किमी में है, वह भारतीय समयानुसार चलता है। भारत मे 2015 ने उसे लीज पर लिया है और वहां भारत का नौसेना व वायुसेना का अड्डा बन रहा है। इस द्वीप के 2 किमी की परिधि के भीतर किसी को भी आने की इजाजत नही है। यहां काम बड़ी तेजी से चल रहा है और सभी निर्माण कार्य 2018 मे पूरा होकर, 2019 में ऑपरेशनल हो जायेगा। यहां भारत ने सैशेल्स से 2016 में पूरी तरह से ऑपरेशनल कोस्टल राडार सिस्टम(CRS) प्राप्त कर लिया है जो भारत को हिंदमहासागर क्षेत्र में गुप्तचर सम्बन्धी कम्युनिकेशन और शत्रुओं की गतिविधियों पर निगरानी रखने में मदद कर रहा है।

इसी के साथ 2015 मे भारत ने मॉरिशस के साथ एक समझौता किया और उसके दो द्वीप नार्थ अगलेगा(12.5 किमी लम्बा और 1.5 किमी चौड़ा) और साउथ अगलेगा(7 किमी लम्बा व 4.5 किमी चौड़ा) को 'डेवेलोप' करने के लिये ले लिया है। वहां भारत एक हवाई पट्टी और बंदरगाह बनायेगा, इसके अलावा, मॉरीशस ने इस 'डेवेलोप' करने व लीज की शर्तों को सर्वजिनिक नही किया है। दरअसल भारत वहां मिलिट्री बेस बना रहा है। यहां यह महत्वपूर्ण है की मॉरीशस, भारत की सिक्योरिटी ग्रिड का भागी है, जिसमे वह भारतीय नौसेना के नेशनल कमांड कंट्रोल कम्युनिकेशन इनटेलीजेंस नेटवर्क, कोस्टल सर्विलांस राडार(CSR) का हिस्सा है। यहां यह संज्ञान रहे की मॉरीशस नौसेना का प्रमुख और नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर,भारतीय अधिकारी होता है।

अब मोदी जी की सरकार ने अपनी रणनीति के अगले क्रम में एक नया समझौता किया है। यह समझौता, मोदी जी की अभी हाल में अरब देशों की यात्रा के दौरान हुआ है और उसको लेकर कोई भी, कहीं भी चर्चा होती नही दिख रही है। मोदी जी ने अपने ओमान के दौरे में उनके सुल्तान सैय्यद क़बूस बिन सैद अल सैद से, ओमान के, सामरिक दृष्टि से अतिमहत्वपूर्ण बंदरगाह दूक़म को सैन्य व लॉजिस्टिक सहयोग लेने के लिये उपयोग करने का अधिकार प्राप्त कर लिया है। इसको लेकर दोनो देशों के बीच मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग साइन हो गया है। भारत के लिए दूक़म, सामरिक दृष्टि से बड़ी महत्वपूर्ण जगह पर स्थित है। एक तो वह भौगोलिक रूप से ऐसी जगह स्थित है जहां से अरब सागर और हिन्द महासागर दोनो ही निगरानी में रहते है और दूसरे वह चाबहार बंदरगाह के पास है, जो भारत के हितों के लिये अतिमहत्वपूर्ण है। मुझे लगता है कि अब उन प्रश्नों को उत्तर मिल गया होगा जो मोदी जी की विदेश यात्राओं के आलोचक थे व जिन्हें मोदी जी द्वारा ओमान के सुल्तान को बार बार हिज हाइनेस कहना अखरा था।

यदि इसको बड़े परिपेक्ष में देखे तो भारत ने चीन के पर्ल ऑफ स्ट्रिंग के सापेक्ष सेशल्स के एसम्पशन द्वीप, मॉरीशस के अगलेगा द्वय द्वीप और ओमान के दूक़म बंदरगाह को लेकर एक श्रंखला बनाई है जो न सिर्फ उसकी सामरिक शक्ति के प्रभाव को विस्तार देगी बल्कि उसके हितों को हिंद महासागर में सुरक्षा भी प्रदान करेगी।

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