मैं बायोडेटा नही हूँ .....
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क्यों और क्या दूँ मैं किसी को अपना बायो-डेटा ? इसमें है ही क्या ? सच तो यही है कि मेरे द्वारा जीवन की कोई त्रिज्या खींची ही नही जा सकी, जिससे कोई परिधि भी बनती और उसमें स्वयं के होने की कोई सूचना भी होती ?
मेरी मूर्खता और मूढ़ता के विस्तार को कोई 'व्यक्तित्व' कह देने की भूल न करें । आज बहुतों के पास वीरताजन्य उपलब्धियां हैं, और होनी भी चाहिए ? मेरे तो पास स्खलित 'शौर्य-पात' जैसी ही दुर्बलताएँ हैं । मैं आखिर इसका क्या करूँ ? आग्रही हूं बिना किसी शिलाजीत का ही शालिग्राम बनने का ।
किसी बाबा बंगाली के न मिल सकने के कारण ही आज एक नामधारी ' बाबा विजयेंद्र ' हो गया हूँ । इस झोले में शाम के खाने का आटा है । कोई डेटा नही । बस इस झोले में झांकते जीवन के खुरदरे और जर्जर सपनों के अहसास भर हैं !
मेरा कोई भी डेटा 'जैविक या ऑर्गेनिक' नही हो सकता है । जो कुछ होगा वह सिंथेटिक, निश्तेज और निष्प्राण ही होगा । कौन जानता है मुझे । मैं अपने को ही नही समझ पाया तो दुनिया क्या मुझे खाक समझेगी ?
बस, कुछ ही गलियां हैं जहां के कुत्ते मुझे देख नही भोंकते ? अनजान गलियों को मैं जानता भी नही जहां मुझे जाना नही है । जहां जाना ही नही हो , उसका क्या अड्रेस पूछना ?
कथित तौर पर मेरा कुछ लिखना, बोलना और करना , मेरे जीवन का खुदरा-व्यापार ही रहा है । खुदरा भी नही वल्कि एक ठीया , जिसको ठिकाना भी नही कह सकते ? यह सत्य है कि सारी उपलब्धियां भौतिक ही होती हैं । यह कभी भी अभौतिक और विद्यमान नही सकती ।
मैं तो 'अ'भाव में ही रहा । जन्म के साथ ही मैं दुर्भाग्य से दीक्षा ले लिया था । मेरे पास कोई 'भाव' नही है । जो कुछ है, वह है केवल बाजार की भाषा और उसकी भंगिमा । मैं अपने जीवन को आजतक केवल 'भाषा' ही दे पाया, कोई भाव नही । परिभाषा और प्रभाव और मेरे जीवन के भाव ? इस जीवन से इसका क्या नाता ?
भौतिक और अभौतिक होते-होते मैं भूत हो गया हूं। मैं वर्तमान की सम्पूर्णता में जी नही पाया । हर पल मैं यूँ ही बीतता रहा, व्यतीत होता रहा । बालबोध के कारण वे कंचे , आज भी कंचन ही नजर आते हैं । काश! आज के ये कंचन भी कंचे हो जाते ?
समय क्या है और यह क्या बिता पायेगा मुझे ? मैं स्वयं बीत गया हूँ । यह बीतराग के सिवाय और क्या है ? काल निष्कलंक है । मेरा यह बजबजाता और बासी वर्तमान मेरे अतीत की ही अभिव्यक्ति भर है । बहुआयामी होने की कोशिश ने मझे बहुरूपिया बना दिया । बाजार में 'काली-गोरी' बन घूमता रहा, लाल-पीले कॉस्ट्यूम्स लगाए । मैं क्या करता ? अपनी ही व्यथा की कथा लिखता रहा ।
रंग-रोगन, चाक्य-चिक्य ? ये सब बिस्तर के ही तो विस्तार हैं ? जीवन एक 'ब्रेड और बेड' का संघर्ष ही तो है। कोई भी 'बायो-डेटा' इस बिस्तर के संघर्षों का ही रोजनामचा होता है। बिस्तर जिनके तंग रह गए और जिनके खोते और खाते में कम कद्रदान ही आ पाए, उनके डेटा कहाँ बन पाते। वे ऐसे जीते रहे कि कभी मरेंगे नही और ऐसे मरते रहे कि वे कभी जीये नही । मैं भी शेष हूं समाप्त होने के लिए। भागफल जीरो बटा सन्नाटा ।
यह दुनिया भी मिल जाये तो क्या हो? बायो डेटा, विजिटिंग-कार्ड, लेटर-हेड और दफ्तर की नाचती कुर्सियों में मुझे अब जीवन नही दिखता । जो प्रदीप्त है उसे प्रमोशन की क्या जरूरत । भीतर का अंधेरा मिट रहा है । दीपक की लौ तेज हो रही है । छवि क्या बनाऊं । छवि भी तो निषेध से ही बनती है । यह कभी विधायक नही होती ?
गांधी और भगत सिंह को नेमप्लेट और विजिट-कार्ड की क्या जरूरत ? असली जीवन का पता तो यही होता है । जो जितने दिव्यांग हैं उनके नेमप्लेट उतने ही बड़े हैं । विचार में दम हो तो उसे प्रचार की क्या जरूरत ? उसे तो कोई भी ले उड़ेगा ।
सेल्फी तो सेल्फिस घराने के शब्द हैं । मरा हुआ किरदार , बेदम लोग, बुझे हुए लोग ही सेल्फी लेते हैं । मरा हुआ व्यक्ति ही किसी दूसरे के फोटो का सहारा लेते हैं । सूर्य कभी सेल्फी नही लेता ! वह सेल्फडिफाइंड है।
आओ ! एक कतरा रोशनी हम स्वयं पैदा करें । हर सुबह जीवन की नई सुबह हो । जो शाम हो गईं उसके प्रति सम्मान से भरें। सुबह का स्वागत करें। जाने वाले कल के प्रति जज़्बाती न हों। जंग जारी हैं । मोर्चे बहुत हैं । उस पार न जाने क्या होगा ?
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