Sunday, 23 September 2018

स्रोत🤔

एक तर्क पूरे देश में तैर रहा है कि मोदी जी का न कोई परिवार है, न कोई वारिस और न कोई संपत्ति वगैरह, वे किसी भी तरह से कोई भ्रष्टाचार कर ही नहीं सकते। धन का उनके लिए कोई व्यक्तिगत न मूल्य है, न मोह।
साधारण विश्वासी हिंदुस्तानी जन इस बात को सही समझते हैं।
और यह बात सच है भी कि मोदी पर आर्थिक भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगा कभी, न उनकी कोई वैयक्तिक संपत्ति निर्माण की कोई परियोजना है।

पर
यहां मामला यह है कि 2014 में प्रधानमंत्री बनने से पहले उनका छह माह में जो भीषण छवि-निर्माण अभियान चला, उसकी लागत कितने हजार करोड़ थी? टीवी पर कितने सेकेंड का कितना मूल्य होता है, और जो टेलिविजन चैनल एक प्रधानमंत्री की सामान्य कवरेज से बढ़कर पूरे जिहादी ढंग से उनकी छवि को 2014 के चुनाव के पहले समर्पित थे और उसके बाद भी पूरे दम से समर्पित हैं, उन सेकेंडों, मिनटों, घंटों की कुछ तो गणना होगी, कुछ तो कीमत होगी?

एक पूरी पुस्तक लिखी जा सकती है एक प्रांतीय नेता के सहसा ‘विकल्पहीन राष्ट्रीय नेता’ में तब्दील हो जाने के इस घटनाक्रम पर। अटल हों या आडवानी, नेहरू हों या इंदिरा, बहुत लंबी प्रक्रिया और बहुत कामों और उपलब्धियों की बहुत जटिल प्रक्रिया के बाद जाकर जननेता बने - सही या गलत। मोदी जी छह माह के भीतर भाजपा के सारे वरिष्ठों को सरकाते हुए जितने बड़े आभामंडल के अधिकारी बन गए, उस आभामंडल का स्रोत क्या है, उसकी कीमत क्या है?

और उसकी कीमत है -- ठीक करेंसी में वह कीमत है, जो उन पर निवेश की गई, और जिसका वसूला जाना व्यापार का जायज तर्क है।

मध्यवर्ग के बेचारे पस्त जन अपने आदर्शों, नैतिकताओं और आचार-विचार के खातों में ही सब कुछ नापने के अभ्यस्त होते हैं।

दुबलापन श्राप या वरदान 😂

पतली लड़कियां थोड़ी सी चालू किस्म की होती है,मतलब ज़्यादा नही बस ज़रा सी। ऐसी लड़कियां शॉपिंग की बड़ी दीवानी होती है और एक दुकान वाले के सारे कपड़े खुलवाकर दूसरी दुकान में चले जाने का अनूठा हुनर इनके भीतर कूट कूटकर भरा होता है। इन्हें फ़ास्ट फ़ूड और भण्डारे में मिलने वाली पूड़ी सब्जी खाना बढ़िया लगता है। ज़्यादातर पतली लड़कियों की दरियादिली का आलम ये है कि इन्हें  मॉल में जाकर अच्छे कपड़ो के साथ सेल्फी लेना और बाद में उन कपड़ो को वही रखकर मॉल के बाहर साइड में खड़े रेहड़ी वाले से 200 रुपए के 2 ड्रेस खरीद लेना बहुत अच्छा लगता है। गीता में शायद इसी दरियादिली को मोहमाया वाली कैटेगिरी में रखा गया है। बाकी पतली लड़कियां किसी को देखकर बहुत जल्दी भावुक हो जाती है और मदद के लिए हमेशा आतुर(तैयार) रहती है। बात पतले लड़को की करे तो ये बेचारे अपने पतलेपन से बेहद परेशान रहते है इन्हें जल्द से जल्द रफीक के लौंडे जैसी तगड़ी बॉडी चाहिए होती है शायद यही वजह है कि दो दिन जिम में जाते ही ये अपने शोल्डर को जिम वाले शीशे के सामने ज़बरदस्ती फुलाकर चेक करने में जुटे रहते है। "बीयर पीने से तगड़े होते है"इस लाइन को सुनकर कई बार पतले लड़के नशेड़ी भी बन जाने का माद्दा रखते है।  इनका जोश वाकई कमाल का होता है, 29 साइज की पेंट और 39 की शर्ट पहनने वाले बंदे भी अपने आपको किसी तीसमारखाँ से कम नही समझते है। बाकी ये काफी दयालु किस्म के होते है और मदद करने में इनको हमेशा आगे वाली पंक्ति में साफ देखा जा सकता है।🙂

Friday, 7 September 2018

"आडम्बर बनाम असलियत "

फिल्म आई PK !

उससे पहले Oh My God आयी थी , दोनो ही फिल्मों के समय हिंदुओ ने खूब हल्ला काटा , कि हमारे धर्म का मजाक उड़ाया गया , हमारे भगवानों का मजाक बनाया गया ।
आमिर खान हाय हाय , अक्षय कुमार हाय हाय !
क्यो भाई क्या गलत दिखाया गया इन दोनों फिल्मों में ?
जागरण में , पंडालों में जो कलाकार भगवान बने होते है वो बैक स्टेज दारू भी पीते है और बीड़ी भी , क्योंकि वो आस्था से ज्यादा रोजी रोटी को मानते है ।

हम हिन्दू क्यो अपने धर्म की बुराइयां एक्सेप्ट नही करते , क्यो नही मान लेते की ड्रामा चल रहा है धर्म और आस्था के नाम पर ।
रोज़ नए नए भगवान पैदा हो रहे है , पहले सिर्फ लक्ष्मी माता थी , अब अलग अलग मंत्रालय बांट दिए गए  , अलग अलग ब्रांच खोल दी गयी , जिससे सोर्स ऑफ इनकम बढ़े , धन लक्ष्मी , वैभव लक्ष्मी , संतान लक्ष्मी , शनि देव ( जिसने पिछले 10 सालों में सबसे ज्यादा तररकी की है ) , साई बाबा भी कमाई वाला मंत्रालय है ।

इन सब से भी मन नही भरता तो निर्मल बाबा , आशाराम बापू , राम रहीम इंसा , राधे माँ मतलब इंन्सानो से ज्यादा भगवान हो गए है । 33 करोड़ देवी देवता कम पड़ गए थे क्या ?

किसी कलाकार का भजन हिट हो जाये तो भगवान बना देंगे उसे , किसी जानवर के एक दो हाथ पैर ज्यादा हो गए तो भगवान बना देंगे उसे ।
किसी गरीब भूखे को खाना नही खिलाएंगे लेकिन मंदिर में दूध दही चढ़ा आएंगे । मतलब बेवकूफियत की हद होती है। 

इतने धकोचलो के बाद भी आप चाहते है हमारे धर्म पर कोई उंगली नही उठाये ।

बड़े बुजुर्गों और हमारे पूर्वजों को पता था कि हम अपनी संस्कृति , अपनी धरोहर , अपने संस्कार , अपने रिश्ते नही बचा पाएंगे , इस लिए हर एक जरूरत की चीज़ से धर्म को जोड़ दिया , जिससे हम उसे बचा कर रखे , भगवान के डर से ।

रक्षा बंधन से लेकर गोबर्धन पूजा तक इन्ही रिश्ते और संस्कारों को बचाने के लिए बनाए गए ।
तमाम कहावते और प्रथाएं भी संस्कृति और प्रकृति को बचाने के लिए बनाई गई ।

जैसे तुलसी कई रोगों में लाभदायक है तो उसे तुलसी माँ बना दिया , गंगा में भी चमत्कारी शक्तियां है , जड़ी बूटियां है हम उसे बचा कर रखे तो उसे धर्म से जोड़ दिया , शिव भगवान की जटाओं से निकाल दिया । इंद्र देव की पूजा क्योकि उससे फसल को पानी मिलता है इज्जत करो बारिश की ,साइंस बता चुका कि बारिश कैसे आती है कैसे बादल बनते है लेकिन आपको लगता है ऊपर इंद्र देव का दफ्तर है।  वहीं से जेड पम्प का बटन दबाया जाता है ।

पीपल की पूजा इस लिए कि अकेला दिन में भी आक्सीजन देने वाला पेड़ है । उल्टी चप्पल से भाग्य नही फूटते , गंदगी फैलती है । इस लिए इसी तरह के तमाम टोटके बनाये पूर्वजो ने ।

गाय पूजनीय है क्योंकि गोबर से लेकर दूध तक सब काम आते है । पर आज गाय के नाम पर कत्लेआम हो रहे है ।

मतलब धर्म ना खाने को देता है ना रक्षा करता है , धर्म की रक्षा हमे करनी होती है धर्म हमे अनुशासन सिखाता है ।

तो तातपर्य यह है कि पीके और ओह माई गॉड जैसी फिल्में हमे आईना दिखाती है , जो हमसे देखा नही जाता । अब कहोगे बाकी धर्मो का मजाक क्यो नही बनाया जाता तो इसका जवाब आपको आमिर खान की फ़िल्म सीक्रेट सुपरस्टार में मिल जाएगा ।

इस्लाम मे औरत की कितनी दुर्दशा है वो इस फ़िल्म में दिखाया गया है , तीन पीढ़ियों की औरतों का दर्द इसमे है । एक सोशल मेसेज के साथ , खैर मेसेज तो पहली दो फिल्मों में भी था लेकिन मैसेज पर गौर करे , हम अपने पूर्वजों के मैसेज नही समझ पाए ये तो है क्या !

सीक्रेट स्टार मे इस्लाम मे औरतों कि स्थिति दिखाई गई लेकिन किसी भी मुस्लिम संगठन ने विरोध नही किया ना कोई फतवा जारी किया गया , क्योकि उन्हें सच्चाई पता अपने धर्म की , इसी लिए चुप रहे , और बता दूं सीक्रेट सुपर स्टार भारत मे बनी फिल्मों में कमाई के मुकाबले चौथे नम्बर पर रहने वाली फिल्म है , बाहुबली के तुंरत पीछे ।

मंदिर मस्जिद बेकारा में जगह घेरे हुए है , इनकी जगह ऐसी बिल्डिंग बना दी जाए जहां लोग किताब कॉपी , दवाई , अनाज चढ़ाए और जरूरतमंद लेकर जाए ।
और पंडित के सर पर सीसीटीवी फिट कर दिया जाए ।

इस कसौटी पर गुरुद्वारे खरे उतरते है ।

Tuesday, 4 September 2018

" मकड़ जाल "

'फील बैड' का खतरा

सुप्रीम कोर्ट की ओर से एससी-एसटी एक्ट में किए गए संशोधन के खिलाफ लाए गए अध्यादेश के बाद सोशल मीडिया पर छेड़ी गई मुहिम अब सड़क पर उतर कर असली रंग दिखा रही है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की जन आशीर्वाद यात्रा पर पथराव के अलावा उन पर जूता तक फेंका जा चुका है। कहीं मंत्रियों को काले झंडे दिखाए जा रहे हैं तो कहीं घेराव हो रहा है। उग्र प्रदर्शनों का खौफ इतना कि कई मंत्रियों को अपने दौरे तक रद्द करने पड़ गए हैं। इधर 6 सितंबर को भारत बंद की तैयारी है। कुल मिलाकर प्रायोजित विरोध अब हकीकत में तब्दील हो चुका है। दाद देनी होगी मोदी विरोधियों की, जिन्होंने सोशल मीडिया पर इतनी चतुराई से पूरी मुहिम को आगे बढ़ाया कि भाजपा समर्थकों को भनक तक नहीं लगी और वे इस प्रायोजित विरोध के भागीदार बनकर नोटा-नोटा जपने लगे।

दरअसल किसी मुहिम के जोर पकड़ने के लिए जो भी बुनियादी तत्व चाहिए वो इस नोटा समर्थित मुहिम में मौजूद हैं। नाराजगी आरक्षण से कहीं ज्यादा एससी-एसटी एक्ट पर मोदी सरकार के रवैये को लेकर है। गौर करने वाली बात ये है कि एससी-एसटी एक्ट के दुष्प्रभावों से प्रभावित होने वालों में केवल सवर्ण ही नहीं बल्कि पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक भी शामिल हैं। अल्पसंख्यक तो खैर भाजपा के वोट बैंक को तहस-नहस होता देखकर किनारे खड़े होकर मजा लूट रहे हैं। पिछड़ा वर्ग चूंकि खुद आरक्षण का लाभार्थी है, लिहाजा वो फिलहाल तटस्थता के भाव के साथ घटनाक्रम का साक्षी बना हुआ है। अब रह गया भाजपा के परंपरागत मतदाता के ठप्पे वाला सवर्ण वर्ग, जो फिलहाल नोटा के जरिए भाजपा का लोटा डुबोने को आमादा है।

वाकई भाजपा फंस चुकी है। ये मकड़जाल खुद उसने बुना है। सवर्ण वर्ग तो आरक्षण को लोकतंत्र की अनिवार्य बुराई मानकर अपनी नियती से समझौता कर चुका था। लेकिन एससी-एसटी एक्ट पर मोदी सरकार के रुख ने सवर्ण बिरादरी में जो बेचैनी की चिंगारी सुलगाई थी वो अब नाराजगी की फूंक पाकर शोला बन चुकी है।

ये सही है कि सवर्णों के आक्रोश को इस मुकाम तक पहुंचाने में मोदी विरोधियों का प्रायोजित विरोध काफी हद तक जिम्मेदार है। लेकिन सवाल उठता है कि ये मौका आखिर दिया किसने? एससी-एसटी एक्ट को लेकर दिए गए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ आखिर उड़ता तीर लेने की जरूरत क्या थी? कोढ़ के ऊपर खाज ये कि एक्ट में शामिल अपराधों की सूची को 22 से बढ़ाकर 47 कर दिया गया। अपनी इस आत्मघाती करतूत को दलितों के सबसे बड़े हितैषी होने का ढिंढोरा पीट कर करेला के ऊपर नीम और चढ़ा दिया गया। दलितों को साधते-साधते भाजपा कब सवर्ण विरोधी के तौर पर स्थापित हो गई खुद भाजपा को ही पता नहीं चला। मंथराएं तो खैर मौके की ताक में बैठी ही थीं, और उन्होंने नोटा की मुहिम को परवान चढ़ाते देर नहीं लगाई। सोशल मीडिया में ढूंढ-ढूंढ कर वो वीडियो पोस्ट किए जा रहे हैं जिसमें अमित शाह और नरेंद्र मोदी भुजाएं फड़काते हुए आरक्षण और एससी-एसटी एक्ट की वकालत करते नजर आ रहे हैं। मामा शिवराज तो खैर माई के लालों को चुनौती देकर काफी पहले से मुसीबत मोल लिए बैठे हैं।

भाजपा को शायद ये भान नहीं था कि वो अपने किस समर्थक वर्ग की नाराजगी मोल लेने जा रही है। ये वो समर्थक वर्ग था जो 'भक्त' की तोहमत सह कर भी मोदी सरकार के हर फैसले के साथ खड़ा रहता था। ये वो समर्थक वर्ग था जिसने नोटबंदी और जीएसटी के कथित दुष्प्रभावों को देशहित में जरूरी मानते हुए परेशानी उठाने के बावजूद सरकार का गुणगान किया था। ये वो समर्थक वर्ग था जो सोशल मीडिया में मोदी विरोधियों की मुहिम का जवाब देने के लिए अपनी निजी संबंधों तक को दांव पर लगाने से गुरेज नहीं करता था। भाजपा इसी मुगालते में रही कि एससी-एसटी एक्ट पर भी उसका ये समर्थक वर्ग उसके पाले में बना रहेगा। लेकिन उसकी यही गलतफहमी उस पर भारी पड़ गई।

ऐसा नहीं है कि भाजपा को बाजी हाथ से निकलने का एहसास नहीं है। पार्टी स्तर पर डैमेज कंट्रोल की कवायद शुरू हो गई है। मुंह फुलाए फूफाओं के मान-मनौव्वल की कोशिश भी जारी है। नोटा की निरर्थकता को सामने रखकर इसके दुष्प्रभाव गिनाए जा रहे हैं। लेकिन मुश्किल ये है कि हर दलील पर उलटा खुद भाजपा ही कटघरे में खड़ी हो जाती है। भाजपाई नोटा की मुहिम से हिंदुत्व के कमजोर होने का डर दिखाते हैं तो उल्टा उन्हीं से हिंदुत्व की मजबूती को लेकर उठाए गए कदमों का हिसाब पूछ लिया जाता है। एससी-एसटी एक्ट पर दिए गए कोर्ट के आदेश को संसद में कानून बनाकर पलटने के बाद अब तो भाजपा और सरकार राम मंदिर के नहीं बन पाने के पीछे कोर्ट की दुहाई भी देने लायक नहीं बची है।

कुल मिलाकर भाजपा के लिए नोटा की मुहिम से निबटना एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। मध्यप्रदेश,राजस्थान और छत्तीसगढ़ में तीन महीने बाद होने जा रहे विधानसभा चुनाव के मद्देनजर ये चुनौती किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। और हो भी क्यों नहीं, आखिर इन प्रदेशों के नतीजों से ही तो लोकसभा का राजपथ प्रशस्त होना है। भाजपा ये याद रखे कि अटल जी ने 'फील गुड' की गलतफहमी में सरकार गंवाई थी, मोदी कहीं सवर्णों के 'फील बैड' का शिकार ना हो जाएं।

डर...

अखबारों ने बताया,टीवी पर सुना है, डरने लगे हैं आप हिंदुस्तान में, ये कैसा डर है... 130 करोड़ के देश के प्रधानमंत्री को गालियां देते हुए, ...