Friday, 22 June 2018

ईद मुबारक ...

सेक्युलरिज़्म दिखाने के लिए ईद मनानी ही पड़े ये ज़रूरी नहीं. मैंने दिखावे से खुद को हमेशा दूर रखा है लेकिन इस बार भी पिछली ही बार की तरह मैं ईद ज़रूर मनाऊंगा. ये सबसे ज़रूरी वक्त है जब ईद मनाई जाए. दिखावे के लिए नहीं बल्कि उस मुस्लिम समाज के साथ खुशियां बांटने के लिए जिसे मौका मिलते ही अहसास कराया जा रहा है कि "तुम्हारा वक्त जा चुका". बंटवारे में हिंदुस्तान को चुन कर हम हिंदुओं पर भरोसा करनेवालों को अगर इस मुल्क में आज खतरा महसूस होता है तो समाज के तौर पर ये हमारी विफलता है. मैं नहीं कहता कि इस देश का मुसलमान हिंदू समाज की किसी दया पर सुरक्षित है लेकिन किसी देश के बहुसंख्यक तबके की सहिष्णुता ही उस देश के अल्पसंख्यकों को आज़ादी की गारंटी होती है.  ये गारंटी हमारे पुरखों ने मुसलमानों को दी थी और मैं उनका वारिस होने के नाते इस गारंटी को निबाहने का ज़िम्मेदार हूं. अपने बाप दादों का वचन ना निबाहने वाली औलादें नालायक होती हैं. मैं खुद को लायक साबित करने के लिए और इस देश में बराबरी के हिस्सेदार मुसलमान को अपनेपन का अहसास दिलाने के लिए जी जान से लगा रहूंगा. इस मिट्टी पर सिख, ईसाई, बौद्ध, बहाई सबका हक है. ये मिट्टी नारंगी नहीं है बल्कि इंद्रधनुषी है. जिसे रंग नहीं दिखते वो वर्णांध (colour blind) होता है.
जय हिंद. ईद मुबारक.

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