Wednesday, 22 August 2018

" The Atal Bihari Vajpai "

नब्बे के दशक में बड़े हो रहे बच्चों के लिए अटल बिहारी वाजपेयी गंभीर विचार का विषय कम थे, नॉस्टेल्जिया का ज़्यादा थे। साल 1996 में जब महज़ 13 दिन तक प्रधानमंत्री रहने के बाद वो लोकसभा में ओजस्वी भाषण आगे सरका कर इस्तीफे की घोषणा कर रहे थे तब मैं 9 साल का था। राजनीति के चाल और चरित्र पर मेरी जानकारी कोरी थी लेकिन अटल का चेहरा याद रह गया। बच्चों को एक्शन हीरोज़ पसंद होते हैं और नब्बे के मध्य और उत्तरार्ध में वो मेरे जैसे कई बच्चों के लिए हीरो जैसे ही थे। उनके उलट कांग्रेस, लेफ्ट या अन्य किसी पार्टी के पास चेहरे या तेवर से चमत्कार करने में सक्षम ऐसा नेता नहीं था जिसकी मास अपील हो। हम तो बच्चे थे, लेकिन आगे चलकर इसी देश की जनता ने अटल बिहारी वाजपेयी को सबसे लोकप्रिय नेता बनाया। शायद देवगौड़ा का कम आकर्षक व्यक्तित्व और आईके गुजराल का शर्मीलापन नब्बे के बच्चों और दस साल बाद वोटर बननेवाली उस बड़ी भीड़ को अपनी ओर खींच नहीं सका, जैसे हाल ही में मनमोहन का संकोच और राहुल की हड़बड़ाहट ने नए नवेले वोटर्स को मोदी के पाले में धकेल दिया।
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आरएसएस ने जो सपना देखा था वो अटल ने पूरा किया। संख्या से बहुत दूर होने के बावजूद प्रधानमंत्री बन कर बैठ गए। जब संख्याबल जुटा ना सके तो शहीद की मुद्रा अपना ली। कांग्रेस की सत्तालोलुपता की वजह से बाद में हमने जो पीएम देखे वो उनके आसपास ठहर नहीं पा रहे थे। ऐसे में दो साल बाद जब वो लौटे तो हमें लगा कि किसी नायक की वापसी हो रही है। मुद्दों और विचारों की समझ तब तक बनी नहीं थी। हम नहीं जानते थे कि सिद्धांतों पर अड़ने की बात कहनेवाली बीजेपी तब सिर्फ सत्ता में टिके रहने के लिए अपने बुनियादी तीन मुद्दों को संदूक में बंद कर आई थी (जो आज तक वहीं सड़ रहे हैं)। 13 महीने बाद जब जयललिता और सुब्रह्मण्यम स्वामी (जो आज भाजपाई हो गए) ने बर्फ के चाकू से अटल सरकार का कत्ल किया तब तक वाजपेयी ने पोकरण परीक्षण कर लिया था। मुझे याद है कि उन दिनों अमेरिका के दबाव की खबरें हम स्कूल में भी सुनते थे। मैं उन दिनों पोकरण से कुछ ही दूरी पर जैसलमेर में पढ़ रहा था।  राजनीतिक तौर पर हमारी रुचि जाग गई थी। इसका श्रेय वाजपेयी को जाता है। हम ज़ोरशोर से कहते थे कि परमाणु बम बनना ही चाहिए। अमेरिका की धौंस ने हमारी नज़रों में नायक जैसे क्लिंटन की छवि भी कमज़ोर की थी, जो बाद में मोनिका लेविंस्की प्रकरण के बाद सिर्फ एक छैले में तब्दील होकर रह गई। मुझे उस समय राजनीति और कूटनीति की बारीकी मालूम नहीं थी, मगर फिर भी समझ रहा था कि भारत दुनिया से अलग-थलग पड़ रहा है और इस दबाव को राजनीतिक तौर पर झेलना बेहद मुश्किल है। अटल वो कर रहे थे।
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उधर पाकिस्तान ने भी देर नहीं लगाई। एटमी धमाके वहां भी हुए। चीन और अमेरिका यूएन में खुलकर भारत के सामने आ गए थे। दिन ब दिन बिगड़ती राजनीतिक परिस्थितियों ने हमारे भीतर खबरों को लेकर भी दिलचस्पी बढ़ा दी और फिर हमने कुछ ही दिनों में उस वाजपेयी को भी देखा जो शांतिदूत बनकर बस से लाहौर जा पहुंचे। कोई बालमन ऐसे प्रधानमंत्री पर दिल कैसे ना हारता जो एक तरफ ताकत दिखाता है और दूसरी तरफ मुहब्बत। अटल लोकप्रियता और प्रभाव के शीर्ष पर थे। कमज़ोर सरकार को हांक रहे एक आदमी का ऐसा आत्मविश्वास तो वाकई हैरान करता है। खुद में ऐसा भरोसा तो मज़बूत सरकार का आनंद भोग रहे पीएम मोदी तक में कभी नहीं झलका।
बेशक इसमें बड़ा हाथ अचानक बढ़े टीवी प्रसारणों का भी था। हम हर ऐतिहासिक घटना को घटता देख रहे थे। अमेरिका वाजपेयी पॉलिटिक्स से कितना हैरान था ये आज कई अमेरिकी मामलों के जानकारों की किताब से मालूम चलता है। मुशर्रफ की महत्वाकांक्षा डिरेल ना करती तो अटल-शरीफ की जोड़ी किसी और हद तक क्लिंटन को हैरान कर सकती थी।
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खैर, अगर-मगर से दुनिया नहीं चलती, चर्चाएं चलती हैं। आगे चलकर महज़ एक वोट से वाजपेयी सरकार 13 महीने बाद गिर गई। इसके बाद पूरे देश ने वो वक्त देखा जब अटल बिहारी वाजपेयी पूरे 5 साल के लिए प्रधानमंत्री बने।
वाजपेयी की शख्सियत के कई पहलू थे। उम्र के हर बदलते दौर में वो थोड़े ज़्यादा परिपक्व हुए। बीजेपी के बनने से पहले वो गैर हिंदुओं के प्रति संगठन की संस्कारजनित नफरत से कैसे ओतप्रोत थे ये उनके कितने ही भाषणों और कविताओं से मालूम चलता है। आडवाणी की रथ यात्रा वाले वक्त से ही उनकी बहुचर्चित सेकुलर दृष्टि विस्तार पाने लगी। कहा तो ये भी जाता है कि वो भविष्य में बननेवाले सत्ता के समीकरण को बूझ गए थे। यही वजह थी कि आडवाणी के मुकाबले उन्होंने अपनी छवि सौम्य कर ली, वरना वीर रस की कविता पढ़नेवाला ओजस्वी कवि भाजपा के कोर इश्यूज़ को दरकिनार ना करता जिसका इनाम उन्हें कांग्रेस के हाथों सत्ता खोकर अपने ही कट्टर वोटर्स की गालियां सुनकर मिला। उससे पहले 2002 में गुजरात दंगों के राजनीतिक खलनायक बनकर उभरे तत्कालीन गुजरात सीएम को कैमरों के सामने राजधर्म निभाने की उनकी झिड़की किसे याद नहीं है? अशांत गुजरात के दौरे पर आए प्रधानमंत्री के सामने खिसियाए नरेंद्र मोदी का चेहरा और 'वही तो कर रहे हैं साब' की टिप्पणी ने ज़ाहिर कर दिया था कि अटल का चित्त भाजपाई का कम धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के मुखिया का ज़्यादा हो चुका था। राजनीतिक करियर के उत्तरार्ध में वाजपेयी का कोई कृत्य इस बात की गवाही नहीं देता कि उनके पूर्व संस्कार बचे रह गए थे। शायद इस बहुरंगी देश और उसकी गंगा जमुनी तहज़ीब ने स्वयंसेवक की सख्त ट्रेनिंग पर जीत हासिल कर ली थी। अटल स्वयं भी राजधर्म के उस सिद्धांत के सामने नत थे जिसकी सीख वो मीडिया के सामने दे रहे थे। बावजूद इसके वो अपने दोस्त आडवाणी के सामने भी नत थे। ये आडवाणी थे जिन्होंने गुजरात दंगों को संभाल ना पाने वाले तत्कालीन सीएम नरेंद्र मोदी के इस्तीफे का बार बार विरोध किया और उतनी ही बार पीएम वाजपेयी ने इसे नतमस्तक होकर स्वीकारा।
भविष्य में गुजरात ने उतना बड़ा दंगा तो नहीं देखा लेकिन यदि उस दिन वाजपेयी गुजरात के मुख्यमंत्री के इस्तीफे को स्वीकार करते तो राजनीति किसी और डगर चली गई होती। दुनिया जानती है कि इसके बाद मोदी ने खुद को विकासपुरूष के तौर पर प्रोजेक्ट करने में सफलता पाई और कुछ ही दिनों बाद हुए चुनाव में हारने के बाद अटल नेपथ्य में चले गए। बीजेपी भले ही मोदी के इस्तीफे के बाद अजीब हालात में पड़ती मगर अटल बिहारी वाजपेयी अपने राजधर्म वाले भाषण को व्यवहारिक बनाकर दल से बड़े हो सकते थे।
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अटल बिहारी वाजपेयी के जाने के बाद उनके एक युग जितने लंबे जीवन के हर पहलू के अनेक विश्लेषण होंगे। वहां नेहरू दिखेंगे, इंदिरा दिखेंगी, नब्बे में सांप्रदायिकता को मिली ज़हरीली हवा दिखेगी, सत्ता के लिए जूझना और अपने सैद्धांतिक मुद्दों को छोड़ पीएम बनना दिखेगा, इक्कीसवीं सदी के भारत के सॉफ्ट वाजपेयी दिखेंगे, अंतत: शाइनिंग इंडिया का पाखंड टूटता दिखेगा। देखने वाले पर निर्भर करेगा कि वो देखना क्या चाहता है। हर रोज़ इंसान पिछले दिन के मुकाबले बदलता है। हर बदलती परिस्थिति में उसकी नीयत और फैसले बदलते हैं। हर बदली नीयत उसके कृतित्व को कुछ से कुछ में ढाल देती है। बेशक वाजपेयी ने नेहरू से मोदी तक की यात्रा की है और लेकिन वो हमारे समय के संजय नहीं थे बल्कि महाभारत में अपनी भूमिका निभाकर अंत में श्रीहीन होकर कहीं छिप गए अश्वत्थामा थे। बाद के नेताओं ने तो उन्हें भीष्म भी नहीं माना। शरशैय्या पर लेटे पितामह का कम से कम उतना आदर तो बचा रहा कि राजपुरुष उनसे राजधर्म की सीख लेने गए, मगर अटल तो पूरी तरह अज्ञातवास झेलने को विवश हुए। दरअसल वो भारत देश के मंच पर खेली जा रही उदार राजनीति के पूरी तरह क्रूर होने से कुछ सेकेंड पहले ही परदे के सामने से उठकर चले गए। हां, गोविंदाचार्य जैसे कुछ लोग इस बात से असहमत हो सकते हैं क्योंकि वाजपेयी की राजनीतिक क्रूरता ने उनकी उड़ान पर रोक लगा दी थी। ऐसे कई और लोग हैं जो उन्हें अपने वक्त का शातिर खिलाड़ी कह सकते हैं मगर उनकी विरासत संभालने का दावा करनेवालों के मुकाबले वो निश्चित ही अधिक ऊंचे थे। कम से कम उन्हें इसका श्रेय तो मिलना ही चाहिए कि उनका समय अघोषित आपातकाल नहीं था और ना उनकी शासकीय नीतियों ने देश के बड़े तबके को सहम जाने के लिए मजबूर ही किया था। बस इतना भर भी काफी है कि हम उन्हें चैन से पंचतत्वों में विलीन हो जाने दें। चर्चा के लिए तो वक्त ही वक्त बचा है और बाकी सभी की तरह भविष्य उनके हिस्से का इंसाफ भी करेगा। कोई जल्दी नहीं है।

Tuesday, 21 August 2018

तस्वीरे ?

किसी बड़े नेता की रैली में पहुंचना हो तो पुलिस से लेकर कार्यकर्ता आपके सफर को आसान और मंगलमय बनाने में कोई खोर कसर नहीं छोड़ेंगे। आपको मिनीमम 1 से डेढ घंटे तो उनका इंतजार करना ही होता है और फिर जबतक वो बोले बैठना है। इस दौरान उठने की कोशिश भी की तो पुलिस वाले तुरंत बिठा देंगे।
दूसरी तस्वीर नामी मंदिर की। भगवान की मूर्ती तक पहुंचना किसी जंग से कम नहीं होता। दर्शन के लिए प्रभु के सामने खड़े भी नहीं हुए कि पुलिस आगे बढा देगी। 10 सेकंड भी मिल जाए तो गनीमत है।
मतलब ये कि सारी ताकतें चाहती है कि इंसानों को ही पूजो और उसी पर आस्था रखो...

लॉजिकल बातें 😊

बाहर रहने वाली लड़कियों के रूम   में मौजूद एक टेडी, बढ़िया से रंग का फोल्डिंग,एक से बढ़कर एक कंपनी की क्रीम और ढेर सारे कपड़े चीख चीखकर वहां किसी लड़की के रहने की गवाही देते है। जबकि बात लड़को की करे तो फोल्डिंग वोल्ड़िंग के खर्चे से लड़के यूँ तो बचने से भरसक प्रयास करते है पर अगर कोई कानपुर साइड का हुआ तो भौकाल (रुतबा) टाइट करने के फेर में फोल्डिंग ले आएगा वरना अधिकतर लौंडे ज़मीन पर ही गद्दे डालकर सोने में यकीन रखते है। टेडीबीयर जैसे बिना मतलब के ढकोसलों के लिए तो लड़को के पास बिल्कुल पैसा नही होता पर हां बिहार साइड के लोग क्रीम पर ज़रूर  खर्चा करते है बाकी फैले हुए बर्तन,गंदगी और इधर उधर पड़े हुए कपड़े ही एक कमरे को "लड़के का रूम" होने की पहचान दिलाते है।

Monday, 20 August 2018

" भगवान की याद आयी "

हे भगवानों .. तुम्हारे लल्लन टॉप टेन मंदिरों का टनाटन कोष ही अरबों खरबों का जिसमें 20 बिलियन से ज्यादा तो पद्मनाभ मन्दिर के ही हेंगे जिनमें से आधा तो केरल के लोगों का ही दिया हुआ सीधे देने से लेके टकले हो होके जिनके बाल आज भी बिक रिये हेंगे बेहतरीन क्वालिटी के होने के चलते .. बाकी .  पैदा होने से लेकर मरने तक के नाम तक का दिया हुआ और इस विश्वास से दिया हुआ कि आप उनकी हमेशा रक्षा करेंगे  ।

इतना देने के बाद भी आप काम नहीं आये .. ऊपर से उन्हें कुत्ते बिल्लियों से मारने प्रलय सी बारिश भेज दी .. उनका investement तो व्यर्थ गया ना ..  तो चलो ब्याज न दो भई .. उनका दिया मूल ही लौटा दो ..  वो मुसीबत में हैं । क्या करोगे इतने अरबों दबाकर जिसका कोई रिटर्न ही नहीं मिला किसी को ? जबकि तुम्हारा हफ्ते हफ्ते का टर्नओवर तक करोड़ों का । ऊपर जाते वक्त क्या साथ जाएगा ?

osss .. सॉरी ... ऊपर तो आप ही हो ..

तो ये नीचे कौन है भई ? कौन से भगवान जो भगवान के नाम पर भगवान बने हुए हैं .. भगवान के नाम बिना रिषेशन के धंधे से हफ्ते हफ्ते करोड़ों का माल कूट रहे हैं और भगवान होते भी मदद नहीं कर रहे अपने भक्तों की ?

कुछ तो काम करो भई भगवानों .. भगवानों जैसा ..  वर्ना कयामत के दिन क्या मुंह लेकर जाओगे भगवान के सामने ?

ओ साईं बाबा .. आप ही कुछ दे दो बाबा .. आप तो जो मांगते थे सब बांट देते थे .. तो जाने के बाद अब इतना क्यों दबाये बैठे हैं अपने एकाउंट में ? अपनी झोली खोलिये बाबा जो इतनी भर चुकी की फट ही न जाये किसी दिन .. टॉप 3 भगवान हेंगे आप आज की तारीख में .. फिर हो जाईयेगा .. अभी तो कुछ बांट दो महाराज.. एकाउंट नंबर तो होगा आपके पास केरल के लोगों को मदद पहुंचाने के लिए .. या वहां जाकर ही कर दीजिए ।
और हां .. अल्लाह और जीजस क्या कर रहे हैं ? करिये कुछ चमत्कार .. वहां आपके भक्त भी तो हैं .. वे पुकार रहे हैं आपको ..
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Thursday, 9 August 2018

" चुनाव मंथन "

आज मन में आया .. चुनाव लड़ लूं ।

सीरियसली ..

बद से बदतर हो रही स्थितियों के बाद भी .. जब भी किसी पार्टी का कोई अंधभक्त समर्थक उपहास वाली हंसी हंसते कहता है - विकल्प क्या हैं तुम्हारे पास बे ? या तो उसे वोट दो या हमें ? यही तो कर सकते हो तुम ? बाद में भीख मांगते रहो की ये कर दो साहब हमारे शहर के लिए .. कस्बे के लिए .. हमारे लिए .. और तुम्हारी औकात क्या ?

तो ये ख्याल शायद बहुतों के मन में आया तो होगा ? आता तो होगा ?

मुझे पता है मैं चुनाव लड़ने वाला नहीं क्योंकि न हराम के पैसे .. न जनता आज की तारीख में बदलाव के लिए तैयार जिसे भेड़ रहने की आदत .. न मुझ जैसे आम आदमी को हराम का खाने की आदत जो इस धंधे में आते ही भरपूर ..

फिर भी ये विचार आज पटल पर की प्रजातंत्र के नाम पर आज की तारीख में हुक्काम तंत्र ने जनता के रास्ते बंद कर रखे हैं की वो उसके सिस्टम में दखल दे और बदलाव , विकास और बेहतरी की पर सही में न चली जाए उनका जमा जमाया धंधा बिगाड़कर  ! हम जनता होने के चलते आज की तारीख में कहीं नहीं .. सोच भी नहीं सकते कि नेता बनें खुद और कुछ सार्थक करें ।

कल एक एक टिकट करोड़ों में तय होंगी जिनके पीछे रेत माफिया से लेकर बिल्डर, दलाल, कॉरपोरेट .. हमारे पास नागनाथ और सांपनाथ में से एक विकल्प होगा बस । मैं भी उन्हीं में से एक को चुनूँगा हर बार की तरह .. पर इस घोषणा के साथ जो मेरा निजी हक है कि .. आपको इसलिए चुन रहा हूं बस की .. आपके सामने मुझ सा कोई नहीं इसलिए कम से कम जलील तो न करें साहेब की हमारी कोई सोच तक नहीं ।
... ....
लोग चाहें तो मजाक उड़ा सकते हैं इस मंथन का पर आज मन में आया तो साझा करना फ़र्ज़ था ।

Wednesday, 8 August 2018

Tv series

।। हिंदी सीरियल की सूची कम्पोजीशन ।।

सिलसिला बदलते रिश्तों का -

भाभी जी घर पे हैं
जीजाजी छत पे हैं !

छज्जे छज्जे पर प्यार
एक बूंद इश्क़
मर्यादा ? लेकिन कब तक ?
एक प्यार ऐसा भी
बीबी तो बीबी साला तो साला !

लव ने मिला दी जोड़ी
और प्यार हो गया
इश्क़ सुभानअल्लाह
इस प्यार को क्या नाम दूं ?

बदलते रिश्तों की दास्तान -
एक दूसरे से करते हैं प्यार हम
अगर तुम साथ हो
आती रहेंगी बहारें
आ गले लग जा ..

कबूल है !

दिल मिल गए !

कुछ रंग प्यार के ऐसे भी
इस प्यार को क्या नाम दूं ?
ये है मोहब्बतें
कैसा ये इश्क़ है अजब सा रिस्क है !

कैसे कहूँ
ये रिश्ता क्या कहलाता है ?
आज की वाइफ सब जानती है !

ऐसा देश है मेरा ..

जाने क्या होगा रामा रे ?
... ......... ............
जारी ..

खुले में शौच से मुक्ति...

"खुले में शौच का अनूठा इतिहास"

पशुवत शौच की संस्कृति समूचे भारत की रग-रग में समाई थी। हालांकि अबोध अवस्था में तिकोनी लंगोटी की आड़ में शुरू हुई यह सभ्यता दो-एक साल का होते-होते खुली नाली पर आ जाती थी। तिकोनी लंगोटी का विकास होते ही उसका इतिहास बदला और हगीज युग की प्रचारमय संस्कृति प्रारंभ हुई।

ग्रामीण शौच का इतिहास भी बेहद अनूठा रहा है। नित्य ही सामूहिक शौच के आयोजन सुबह-शाम गाँव की गलियों से खेतों की पगडंडियों तक होते थे। इन राहों पर गाँव की महिलाओं की लोटा-यात्रा में समाई उनकी हंसी की खनक और कभी-कभी लोकगीतों की गूँज इस पूरे परिवेश को मनमोहक बना देती थी। नदी किनारे बसे गाँवों में शौच काल में लोटे का प्रयोग सर्वदा निंदनीय ही रहा।

विकास काल में रेल मंत्रालय ने शौच के इतिहास में क्रांति कर दी, देश को सबसे बड़ा "छत-द्वार विमुक्त" शौचालय उपलब्ध करा कर। कालांतर में यही शौचालय "रेल की पटरी" के नाम से प्रसिद्ध हुआ। बड़े-बड़े खेतों में सामूहिक शौच की परंपरा ने भाई-चारे को भी मजबूती प्रदान की।

इतिहास साक्षी है कि इस खुली शौच परंपरा ने ही कई प्रेमी युगलों को आपस में मिलाया और उनके मिलन का साक्षी, हाथों में सधा वो लोटा ही रहा।

खेतों की पगडंडी की तरफ लोटे के साथ लंबे घूंघट में गमन करता बहुओं का समूह सासु-निंदा की किलोल करता था। गोल घेरे में बैठकर फारिग होना और सास-ननद का रोना रोना सामूहिक शौच के उत्सवी हिस्से थे।

एक बिगड़ैल सांड के खेत में अचानक आ जाने से हमारे मित्र का लोटा चारों खाने चित हो गया। हड़बड़ी में भागे मित्र अपने किए पर ही पांव धर गए।

इतिहास के कुछ पन्नों में नाड़ेदार कच्छे और पाजामे भी दर्ज हैं। ऐसे पाजामे, जिनके नकचढ़े नाड़ों ने ऐन मौके पर खुलने से इंकार कर अपनी कुर्बानियां दीं।

खुले में शौच एक परंपरा है, एक संस्कार है। इसी परंपरा के चलते गांव के "लटूरी दास" की बेटी लोटा लेकर खेत में गई और साल भर बाद गोद में लल्ला लेकर लौटी।

"मुसद्दी" पहलवान खेत में ही अपनी पुरानी दुश्मनी के चलते खेत रहे। लोटा लेकर जो बैठे तो दुश्मनों ने उठने का मौका ही न दिया। लोटे का पानी आंसुओं की तरह बह गया।

खुले में शौच के हजार रोचक किस्से हैं। मसलन बारिश में हरी-हरी घास जब खेतों में आपकी बैठक का विरोध करती है और तब आप प्रतिकार में उस पर बोझ डाल कर लम्बी सांस छोड़ कर अलौकिक सुख का अनुभव करते हैं।

अनुभवहीन शौचार्थी जब तक लोटे के साथ सुरक्षित कोना तलाश रहा होता है तब तक अनुभवी शौचार्थी फारिग हो कर विजयी मुस्कान के साथ अपना पंचा-फेंटा बांध रहा होता है।

संक्षेप में कहें तो जिस मनुष्य ने खुले में शौच का आनंद नहीं लिया उसका मानव योनि में जन्म लेना ही व्यर्थ है। 200 आदमियों की बारात के बीच दस-बारह लोटे बार-बार खेत से जनवासे तक दौड़ कर कन्यादान के प्रति अपना दायित्व निभाते रहे हैं।

खुले में शौच की विकास गाथा को कालांतर में लोटे के कंधों के भार को प्लास्टिक की बोतलों ने भी बांटा है। ट्रक-ड्रायवरों और हाइवे के ढ़ाबा-संचालकों की इन बोतलों ने बेहद सेवा की है। आपातकालीन खुल्लम-खुल्ला शौच में अखबारी कागज, पत्ते-गत्ते, मिट्टी के ढ़ेलों और पत्थर के टुकड़ों का भी अविस्मरणीय योगदान रहा है।

इस सांस्कारिक परंपरा को बंदकर इतिहास से छेड़छाड़ करने का हक समाज में किसी को भी नहीं है। खुले में शौच मानव का सामाजिक, सांस्कृतिक अधिकार है। खुले में शौच बंद होने से आने वाली पीढ़ी इस अभूतपूर्व सुख से वंचित रहेगी और इस वंचना के लिए हमें कोसती रहेगी।

‍♂ हास्य व्यंग्य के साथ, कृपया अन्यथा न लें।

डर...

अखबारों ने बताया,टीवी पर सुना है, डरने लगे हैं आप हिंदुस्तान में, ये कैसा डर है... 130 करोड़ के देश के प्रधानमंत्री को गालियां देते हुए, ...