पहले जाति आई , बाद में आरक्षण आया. आरक्षण ख़त्म होने से जाति ख़त्म नहीं होगी. लेकिन जाति ख़त्म होने से आरक्षण ख़त्म हो जायेगा.
तो फिर सवर्णों का संगठित विरोध जाति-प्रथा के उन्मूलन के लिए क्यों नहीं दिखता है ? क्या वो नहीं चाहते कि आरक्षण की मूल जड़ ही समाप्त हो जाए ? जाति से उपजी सामाजिक गैर-बराबरी खत्म हो जाए ?
इनका विरोध महज़ आरक्षण को लेकर ही क्यों रहता है ?
सवाल और भी है ....
आरक्षण लागू होने के बाद सवर्णों ने जाति-प्रथा के उन्मूलन के लिए कितने बड़े आन्दोलन किये हैं ? वो कितनी बार भारी संख्या में सड़क पर उतरे हैं ?
ऐसे आन्दोलन आज भी वंचित वर्ग तक ही क्यों सीमित हैं ?
आरक्षण-विरोधी आन्दोलन तो सवर्णों द्वारा प्रायः देश के किसी न किसी हिस्से में देखने को मिल जाता है लेकिन जाति-प्रथा के विरोध में ये कोई बड़ा आन्दोलन क्यों नहीं करते हैं ?
बात बिलकुल साफ़ है. आरक्षण का विरोध घोर जातिवादी और जाति-व्यवस्था को बनाए रखने में यकीन करने वाले लोग ही करते हैं क्योंकि जाति उनके हित में है. यह व्यवस्था उनकी स्वघोषित सामाजिक श्रेष्ठता को बनाए रखने वाली है. अपने कर्म से ज्यादा कथित जातीय श्रेष्ठता से इन्हें संबल मिलता है.
ये समाप्त हो गयी तो इनकी जातीय श्रेष्ठता भी समाप्त हो जाएगी. इनकी वह रीढ़ टूट जायेगी , जिसके दम पर ये मेरिट और श्रेष्ठता का दावा कर उछलकूद करते रहते हैं. इसीलिए ये इसको बनाए रखने के लिए खुले या छिपे तौर पर हर सम्भव प्रयास करते हैं.
आरक्षण का विरोध जातिगत कुंठा से भी जुड़ा है जो आज विभिन्न क्षेत्रो में सवर्णों के टूटते हुए वर्चस्व का परिणाम है. आरक्षण ने इनके जातीय दंभ को कुंठा में बदल दिया है. यह इनके लिए नासूर बन गया है जो वंचितों की हर क्षेत्र में बढ़ती भागीदारी के साथ गहराता जा रहा है. ऐसे में कथित जातिगत श्रेष्ठता ही इनकी कुंठा को कुछ कम कर पाती है. इन्हें वो साहस दे पाती है जिससे ये अपने से श्रेष्ठ वंचित वर्ग के व्यक्ति के सामने भी अकड़ दिखा पाते हैं. ये इनके लिए घावों पर क्षणिक आराम देने वाले मरहम की तरह काम करती है. ये इनका एनर्जी बूस्टर है. अगर जाति-प्रथा हो समाप्त हो गयी तो इनका कामचलाऊ मरहम तो छिन ही जाएगा साथ ही इनके घावों पर भी नमक-मिर्च लग जायेगी. ये सुस्त पड़ जाएंगे.
इसके अलावा , ये जानते हैं कि जाति ख़त्म होने का मतलब होगा एक दलित, पिछड़े या आदिवासी के घर से रोटी-बेटी का सम्बन्ध बनाना.
ये जानते है कि जाति ख़त्म होने का मतलब होगा धार्मिक संस्थाओं में सबकी बराबर भागीदारी होना.
ये जानते हैं कि जाति ख़त्म होने का मतलब होगा जमीन-जायदाद में सभी को समान रूप से भागीदार बनाना.
ये जानते हैं कि जाति ख़त्म होने का मतलब होगा हर उस क्षेत्र में समान भागीदारी , जहां सदियों से इनका कब्ज़ा है.
ये यह भी जानते हैं कि आज के दौर में नाम के बाद तिवारी , चौबे , दूबे , छब्बे हटाने का कोई मतलब नहीं है . ये सब महज़ प्रगतिशीलता के नाम पर ढोंग करना है और छिपे तौर पर अपने जातिवादी अजेंडे को आगे बढ़ाना है.
ये जानते है कि जाति के नाम पर मौन रहना ही श्रेयस्कर है. इसके विरोध में लिखने बोलने की जिम्मेदारी इनकी नहीं सिर्फ वंचितों की है.
ये जानते हैं कि आरक्षण विरोधियो को छुप कर समर्थन करना और लोगो के सामने प्रगतिशील बनना कितना जरुरी है.
ये जानते हैं कि आरक्षण की युवाओ के दिमाग में नकारात्मक छवि बनाना कितना जरुरी है. इसके लिए चाहे आरक्षण को अन्यायपूर्ण व्यवस्था कहना पड़े या समान शिक्षा और आर्थिक समानता के बरक्स उसे बेकार दिखाना पड़े , ये दोनों के पक्ष में तर्क गढ़ते हैं.
ये जानते हैं कि फरेब और मक्कारी की सारी हदे पार करना कितना जरुरी है.
ये वो सब जानते हैं जिसे आप प्रायः नहीं समझ पाते या जिस पर ध्यान नहीं देते हैं.
इसीलिए ये जाति-प्रथा का विरोध नहीं करते हैं. इनकी कुंठित खोपड़ी में जाति समाप्त करने की बजाय आरक्षण समाप्त करने के नए-नए फार्मूले इजाद होते रहते हैं. इनके दिमाग की सारी उर्वरता अन्याय और असमानता कायम करने वाली ज़मीन पर ही फलित होती है. इन्हें समझना मुश्किल नहीं है. बस वहां से सोचना शुरू करिये जहां इनकी सोच खत्म होती है.
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