Thursday, 9 August 2018

" चुनाव मंथन "

आज मन में आया .. चुनाव लड़ लूं ।

सीरियसली ..

बद से बदतर हो रही स्थितियों के बाद भी .. जब भी किसी पार्टी का कोई अंधभक्त समर्थक उपहास वाली हंसी हंसते कहता है - विकल्प क्या हैं तुम्हारे पास बे ? या तो उसे वोट दो या हमें ? यही तो कर सकते हो तुम ? बाद में भीख मांगते रहो की ये कर दो साहब हमारे शहर के लिए .. कस्बे के लिए .. हमारे लिए .. और तुम्हारी औकात क्या ?

तो ये ख्याल शायद बहुतों के मन में आया तो होगा ? आता तो होगा ?

मुझे पता है मैं चुनाव लड़ने वाला नहीं क्योंकि न हराम के पैसे .. न जनता आज की तारीख में बदलाव के लिए तैयार जिसे भेड़ रहने की आदत .. न मुझ जैसे आम आदमी को हराम का खाने की आदत जो इस धंधे में आते ही भरपूर ..

फिर भी ये विचार आज पटल पर की प्रजातंत्र के नाम पर आज की तारीख में हुक्काम तंत्र ने जनता के रास्ते बंद कर रखे हैं की वो उसके सिस्टम में दखल दे और बदलाव , विकास और बेहतरी की पर सही में न चली जाए उनका जमा जमाया धंधा बिगाड़कर  ! हम जनता होने के चलते आज की तारीख में कहीं नहीं .. सोच भी नहीं सकते कि नेता बनें खुद और कुछ सार्थक करें ।

कल एक एक टिकट करोड़ों में तय होंगी जिनके पीछे रेत माफिया से लेकर बिल्डर, दलाल, कॉरपोरेट .. हमारे पास नागनाथ और सांपनाथ में से एक विकल्प होगा बस । मैं भी उन्हीं में से एक को चुनूँगा हर बार की तरह .. पर इस घोषणा के साथ जो मेरा निजी हक है कि .. आपको इसलिए चुन रहा हूं बस की .. आपके सामने मुझ सा कोई नहीं इसलिए कम से कम जलील तो न करें साहेब की हमारी कोई सोच तक नहीं ।
... ....
लोग चाहें तो मजाक उड़ा सकते हैं इस मंथन का पर आज मन में आया तो साझा करना फ़र्ज़ था ।

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