नब्बे के दशक में बड़े हो रहे बच्चों के लिए अटल बिहारी वाजपेयी गंभीर विचार का विषय कम थे, नॉस्टेल्जिया का ज़्यादा थे। साल 1996 में जब महज़ 13 दिन तक प्रधानमंत्री रहने के बाद वो लोकसभा में ओजस्वी भाषण आगे सरका कर इस्तीफे की घोषणा कर रहे थे तब मैं 9 साल का था। राजनीति के चाल और चरित्र पर मेरी जानकारी कोरी थी लेकिन अटल का चेहरा याद रह गया। बच्चों को एक्शन हीरोज़ पसंद होते हैं और नब्बे के मध्य और उत्तरार्ध में वो मेरे जैसे कई बच्चों के लिए हीरो जैसे ही थे। उनके उलट कांग्रेस, लेफ्ट या अन्य किसी पार्टी के पास चेहरे या तेवर से चमत्कार करने में सक्षम ऐसा नेता नहीं था जिसकी मास अपील हो। हम तो बच्चे थे, लेकिन आगे चलकर इसी देश की जनता ने अटल बिहारी वाजपेयी को सबसे लोकप्रिय नेता बनाया। शायद देवगौड़ा का कम आकर्षक व्यक्तित्व और आईके गुजराल का शर्मीलापन नब्बे के बच्चों और दस साल बाद वोटर बननेवाली उस बड़ी भीड़ को अपनी ओर खींच नहीं सका, जैसे हाल ही में मनमोहन का संकोच और राहुल की हड़बड़ाहट ने नए नवेले वोटर्स को मोदी के पाले में धकेल दिया।
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आरएसएस ने जो सपना देखा था वो अटल ने पूरा किया। संख्या से बहुत दूर होने के बावजूद प्रधानमंत्री बन कर बैठ गए। जब संख्याबल जुटा ना सके तो शहीद की मुद्रा अपना ली। कांग्रेस की सत्तालोलुपता की वजह से बाद में हमने जो पीएम देखे वो उनके आसपास ठहर नहीं पा रहे थे। ऐसे में दो साल बाद जब वो लौटे तो हमें लगा कि किसी नायक की वापसी हो रही है। मुद्दों और विचारों की समझ तब तक बनी नहीं थी। हम नहीं जानते थे कि सिद्धांतों पर अड़ने की बात कहनेवाली बीजेपी तब सिर्फ सत्ता में टिके रहने के लिए अपने बुनियादी तीन मुद्दों को संदूक में बंद कर आई थी (जो आज तक वहीं सड़ रहे हैं)। 13 महीने बाद जब जयललिता और सुब्रह्मण्यम स्वामी (जो आज भाजपाई हो गए) ने बर्फ के चाकू से अटल सरकार का कत्ल किया तब तक वाजपेयी ने पोकरण परीक्षण कर लिया था। मुझे याद है कि उन दिनों अमेरिका के दबाव की खबरें हम स्कूल में भी सुनते थे। मैं उन दिनों पोकरण से कुछ ही दूरी पर जैसलमेर में पढ़ रहा था। राजनीतिक तौर पर हमारी रुचि जाग गई थी। इसका श्रेय वाजपेयी को जाता है। हम ज़ोरशोर से कहते थे कि परमाणु बम बनना ही चाहिए। अमेरिका की धौंस ने हमारी नज़रों में नायक जैसे क्लिंटन की छवि भी कमज़ोर की थी, जो बाद में मोनिका लेविंस्की प्रकरण के बाद सिर्फ एक छैले में तब्दील होकर रह गई। मुझे उस समय राजनीति और कूटनीति की बारीकी मालूम नहीं थी, मगर फिर भी समझ रहा था कि भारत दुनिया से अलग-थलग पड़ रहा है और इस दबाव को राजनीतिक तौर पर झेलना बेहद मुश्किल है। अटल वो कर रहे थे।
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उधर पाकिस्तान ने भी देर नहीं लगाई। एटमी धमाके वहां भी हुए। चीन और अमेरिका यूएन में खुलकर भारत के सामने आ गए थे। दिन ब दिन बिगड़ती राजनीतिक परिस्थितियों ने हमारे भीतर खबरों को लेकर भी दिलचस्पी बढ़ा दी और फिर हमने कुछ ही दिनों में उस वाजपेयी को भी देखा जो शांतिदूत बनकर बस से लाहौर जा पहुंचे। कोई बालमन ऐसे प्रधानमंत्री पर दिल कैसे ना हारता जो एक तरफ ताकत दिखाता है और दूसरी तरफ मुहब्बत। अटल लोकप्रियता और प्रभाव के शीर्ष पर थे। कमज़ोर सरकार को हांक रहे एक आदमी का ऐसा आत्मविश्वास तो वाकई हैरान करता है। खुद में ऐसा भरोसा तो मज़बूत सरकार का आनंद भोग रहे पीएम मोदी तक में कभी नहीं झलका।
बेशक इसमें बड़ा हाथ अचानक बढ़े टीवी प्रसारणों का भी था। हम हर ऐतिहासिक घटना को घटता देख रहे थे। अमेरिका वाजपेयी पॉलिटिक्स से कितना हैरान था ये आज कई अमेरिकी मामलों के जानकारों की किताब से मालूम चलता है। मुशर्रफ की महत्वाकांक्षा डिरेल ना करती तो अटल-शरीफ की जोड़ी किसी और हद तक क्लिंटन को हैरान कर सकती थी।
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खैर, अगर-मगर से दुनिया नहीं चलती, चर्चाएं चलती हैं। आगे चलकर महज़ एक वोट से वाजपेयी सरकार 13 महीने बाद गिर गई। इसके बाद पूरे देश ने वो वक्त देखा जब अटल बिहारी वाजपेयी पूरे 5 साल के लिए प्रधानमंत्री बने।
वाजपेयी की शख्सियत के कई पहलू थे। उम्र के हर बदलते दौर में वो थोड़े ज़्यादा परिपक्व हुए। बीजेपी के बनने से पहले वो गैर हिंदुओं के प्रति संगठन की संस्कारजनित नफरत से कैसे ओतप्रोत थे ये उनके कितने ही भाषणों और कविताओं से मालूम चलता है। आडवाणी की रथ यात्रा वाले वक्त से ही उनकी बहुचर्चित सेकुलर दृष्टि विस्तार पाने लगी। कहा तो ये भी जाता है कि वो भविष्य में बननेवाले सत्ता के समीकरण को बूझ गए थे। यही वजह थी कि आडवाणी के मुकाबले उन्होंने अपनी छवि सौम्य कर ली, वरना वीर रस की कविता पढ़नेवाला ओजस्वी कवि भाजपा के कोर इश्यूज़ को दरकिनार ना करता जिसका इनाम उन्हें कांग्रेस के हाथों सत्ता खोकर अपने ही कट्टर वोटर्स की गालियां सुनकर मिला। उससे पहले 2002 में गुजरात दंगों के राजनीतिक खलनायक बनकर उभरे तत्कालीन गुजरात सीएम को कैमरों के सामने राजधर्म निभाने की उनकी झिड़की किसे याद नहीं है? अशांत गुजरात के दौरे पर आए प्रधानमंत्री के सामने खिसियाए नरेंद्र मोदी का चेहरा और 'वही तो कर रहे हैं साब' की टिप्पणी ने ज़ाहिर कर दिया था कि अटल का चित्त भाजपाई का कम धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के मुखिया का ज़्यादा हो चुका था। राजनीतिक करियर के उत्तरार्ध में वाजपेयी का कोई कृत्य इस बात की गवाही नहीं देता कि उनके पूर्व संस्कार बचे रह गए थे। शायद इस बहुरंगी देश और उसकी गंगा जमुनी तहज़ीब ने स्वयंसेवक की सख्त ट्रेनिंग पर जीत हासिल कर ली थी। अटल स्वयं भी राजधर्म के उस सिद्धांत के सामने नत थे जिसकी सीख वो मीडिया के सामने दे रहे थे। बावजूद इसके वो अपने दोस्त आडवाणी के सामने भी नत थे। ये आडवाणी थे जिन्होंने गुजरात दंगों को संभाल ना पाने वाले तत्कालीन सीएम नरेंद्र मोदी के इस्तीफे का बार बार विरोध किया और उतनी ही बार पीएम वाजपेयी ने इसे नतमस्तक होकर स्वीकारा।
भविष्य में गुजरात ने उतना बड़ा दंगा तो नहीं देखा लेकिन यदि उस दिन वाजपेयी गुजरात के मुख्यमंत्री के इस्तीफे को स्वीकार करते तो राजनीति किसी और डगर चली गई होती। दुनिया जानती है कि इसके बाद मोदी ने खुद को विकासपुरूष के तौर पर प्रोजेक्ट करने में सफलता पाई और कुछ ही दिनों बाद हुए चुनाव में हारने के बाद अटल नेपथ्य में चले गए। बीजेपी भले ही मोदी के इस्तीफे के बाद अजीब हालात में पड़ती मगर अटल बिहारी वाजपेयी अपने राजधर्म वाले भाषण को व्यवहारिक बनाकर दल से बड़े हो सकते थे।
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अटल बिहारी वाजपेयी के जाने के बाद उनके एक युग जितने लंबे जीवन के हर पहलू के अनेक विश्लेषण होंगे। वहां नेहरू दिखेंगे, इंदिरा दिखेंगी, नब्बे में सांप्रदायिकता को मिली ज़हरीली हवा दिखेगी, सत्ता के लिए जूझना और अपने सैद्धांतिक मुद्दों को छोड़ पीएम बनना दिखेगा, इक्कीसवीं सदी के भारत के सॉफ्ट वाजपेयी दिखेंगे, अंतत: शाइनिंग इंडिया का पाखंड टूटता दिखेगा। देखने वाले पर निर्भर करेगा कि वो देखना क्या चाहता है। हर रोज़ इंसान पिछले दिन के मुकाबले बदलता है। हर बदलती परिस्थिति में उसकी नीयत और फैसले बदलते हैं। हर बदली नीयत उसके कृतित्व को कुछ से कुछ में ढाल देती है। बेशक वाजपेयी ने नेहरू से मोदी तक की यात्रा की है और लेकिन वो हमारे समय के संजय नहीं थे बल्कि महाभारत में अपनी भूमिका निभाकर अंत में श्रीहीन होकर कहीं छिप गए अश्वत्थामा थे। बाद के नेताओं ने तो उन्हें भीष्म भी नहीं माना। शरशैय्या पर लेटे पितामह का कम से कम उतना आदर तो बचा रहा कि राजपुरुष उनसे राजधर्म की सीख लेने गए, मगर अटल तो पूरी तरह अज्ञातवास झेलने को विवश हुए। दरअसल वो भारत देश के मंच पर खेली जा रही उदार राजनीति के पूरी तरह क्रूर होने से कुछ सेकेंड पहले ही परदे के सामने से उठकर चले गए। हां, गोविंदाचार्य जैसे कुछ लोग इस बात से असहमत हो सकते हैं क्योंकि वाजपेयी की राजनीतिक क्रूरता ने उनकी उड़ान पर रोक लगा दी थी। ऐसे कई और लोग हैं जो उन्हें अपने वक्त का शातिर खिलाड़ी कह सकते हैं मगर उनकी विरासत संभालने का दावा करनेवालों के मुकाबले वो निश्चित ही अधिक ऊंचे थे। कम से कम उन्हें इसका श्रेय तो मिलना ही चाहिए कि उनका समय अघोषित आपातकाल नहीं था और ना उनकी शासकीय नीतियों ने देश के बड़े तबके को सहम जाने के लिए मजबूर ही किया था। बस इतना भर भी काफी है कि हम उन्हें चैन से पंचतत्वों में विलीन हो जाने दें। चर्चा के लिए तो वक्त ही वक्त बचा है और बाकी सभी की तरह भविष्य उनके हिस्से का इंसाफ भी करेगा। कोई जल्दी नहीं है।
मतलबी दुनिया को बयां करना , इन जज्बातों की तौहीन है , दिल पर अश्क है जाया >> फिर भी एक कोशिश है लोगों को मनाने की ?
Wednesday, 22 August 2018
" The Atal Bihari Vajpai "
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डर...
अखबारों ने बताया,टीवी पर सुना है, डरने लगे हैं आप हिंदुस्तान में, ये कैसा डर है... 130 करोड़ के देश के प्रधानमंत्री को गालियां देते हुए, ...
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