Wednesday, 8 August 2018

खुले में शौच से मुक्ति...

"खुले में शौच का अनूठा इतिहास"

पशुवत शौच की संस्कृति समूचे भारत की रग-रग में समाई थी। हालांकि अबोध अवस्था में तिकोनी लंगोटी की आड़ में शुरू हुई यह सभ्यता दो-एक साल का होते-होते खुली नाली पर आ जाती थी। तिकोनी लंगोटी का विकास होते ही उसका इतिहास बदला और हगीज युग की प्रचारमय संस्कृति प्रारंभ हुई।

ग्रामीण शौच का इतिहास भी बेहद अनूठा रहा है। नित्य ही सामूहिक शौच के आयोजन सुबह-शाम गाँव की गलियों से खेतों की पगडंडियों तक होते थे। इन राहों पर गाँव की महिलाओं की लोटा-यात्रा में समाई उनकी हंसी की खनक और कभी-कभी लोकगीतों की गूँज इस पूरे परिवेश को मनमोहक बना देती थी। नदी किनारे बसे गाँवों में शौच काल में लोटे का प्रयोग सर्वदा निंदनीय ही रहा।

विकास काल में रेल मंत्रालय ने शौच के इतिहास में क्रांति कर दी, देश को सबसे बड़ा "छत-द्वार विमुक्त" शौचालय उपलब्ध करा कर। कालांतर में यही शौचालय "रेल की पटरी" के नाम से प्रसिद्ध हुआ। बड़े-बड़े खेतों में सामूहिक शौच की परंपरा ने भाई-चारे को भी मजबूती प्रदान की।

इतिहास साक्षी है कि इस खुली शौच परंपरा ने ही कई प्रेमी युगलों को आपस में मिलाया और उनके मिलन का साक्षी, हाथों में सधा वो लोटा ही रहा।

खेतों की पगडंडी की तरफ लोटे के साथ लंबे घूंघट में गमन करता बहुओं का समूह सासु-निंदा की किलोल करता था। गोल घेरे में बैठकर फारिग होना और सास-ननद का रोना रोना सामूहिक शौच के उत्सवी हिस्से थे।

एक बिगड़ैल सांड के खेत में अचानक आ जाने से हमारे मित्र का लोटा चारों खाने चित हो गया। हड़बड़ी में भागे मित्र अपने किए पर ही पांव धर गए।

इतिहास के कुछ पन्नों में नाड़ेदार कच्छे और पाजामे भी दर्ज हैं। ऐसे पाजामे, जिनके नकचढ़े नाड़ों ने ऐन मौके पर खुलने से इंकार कर अपनी कुर्बानियां दीं।

खुले में शौच एक परंपरा है, एक संस्कार है। इसी परंपरा के चलते गांव के "लटूरी दास" की बेटी लोटा लेकर खेत में गई और साल भर बाद गोद में लल्ला लेकर लौटी।

"मुसद्दी" पहलवान खेत में ही अपनी पुरानी दुश्मनी के चलते खेत रहे। लोटा लेकर जो बैठे तो दुश्मनों ने उठने का मौका ही न दिया। लोटे का पानी आंसुओं की तरह बह गया।

खुले में शौच के हजार रोचक किस्से हैं। मसलन बारिश में हरी-हरी घास जब खेतों में आपकी बैठक का विरोध करती है और तब आप प्रतिकार में उस पर बोझ डाल कर लम्बी सांस छोड़ कर अलौकिक सुख का अनुभव करते हैं।

अनुभवहीन शौचार्थी जब तक लोटे के साथ सुरक्षित कोना तलाश रहा होता है तब तक अनुभवी शौचार्थी फारिग हो कर विजयी मुस्कान के साथ अपना पंचा-फेंटा बांध रहा होता है।

संक्षेप में कहें तो जिस मनुष्य ने खुले में शौच का आनंद नहीं लिया उसका मानव योनि में जन्म लेना ही व्यर्थ है। 200 आदमियों की बारात के बीच दस-बारह लोटे बार-बार खेत से जनवासे तक दौड़ कर कन्यादान के प्रति अपना दायित्व निभाते रहे हैं।

खुले में शौच की विकास गाथा को कालांतर में लोटे के कंधों के भार को प्लास्टिक की बोतलों ने भी बांटा है। ट्रक-ड्रायवरों और हाइवे के ढ़ाबा-संचालकों की इन बोतलों ने बेहद सेवा की है। आपातकालीन खुल्लम-खुल्ला शौच में अखबारी कागज, पत्ते-गत्ते, मिट्टी के ढ़ेलों और पत्थर के टुकड़ों का भी अविस्मरणीय योगदान रहा है।

इस सांस्कारिक परंपरा को बंदकर इतिहास से छेड़छाड़ करने का हक समाज में किसी को भी नहीं है। खुले में शौच मानव का सामाजिक, सांस्कृतिक अधिकार है। खुले में शौच बंद होने से आने वाली पीढ़ी इस अभूतपूर्व सुख से वंचित रहेगी और इस वंचना के लिए हमें कोसती रहेगी।

‍♂ हास्य व्यंग्य के साथ, कृपया अन्यथा न लें।

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