एक तर्क पूरे देश में तैर रहा है कि मोदी जी का न कोई परिवार है, न कोई वारिस और न कोई संपत्ति वगैरह, वे किसी भी तरह से कोई भ्रष्टाचार कर ही नहीं सकते। धन का उनके लिए कोई व्यक्तिगत न मूल्य है, न मोह।
साधारण विश्वासी हिंदुस्तानी जन इस बात को सही समझते हैं।
और यह बात सच है भी कि मोदी पर आर्थिक भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगा कभी, न उनकी कोई वैयक्तिक संपत्ति निर्माण की कोई परियोजना है।
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यहां मामला यह है कि 2014 में प्रधानमंत्री बनने से पहले उनका छह माह में जो भीषण छवि-निर्माण अभियान चला, उसकी लागत कितने हजार करोड़ थी? टीवी पर कितने सेकेंड का कितना मूल्य होता है, और जो टेलिविजन चैनल एक प्रधानमंत्री की सामान्य कवरेज से बढ़कर पूरे जिहादी ढंग से उनकी छवि को 2014 के चुनाव के पहले समर्पित थे और उसके बाद भी पूरे दम से समर्पित हैं, उन सेकेंडों, मिनटों, घंटों की कुछ तो गणना होगी, कुछ तो कीमत होगी?
एक पूरी पुस्तक लिखी जा सकती है एक प्रांतीय नेता के सहसा ‘विकल्पहीन राष्ट्रीय नेता’ में तब्दील हो जाने के इस घटनाक्रम पर। अटल हों या आडवानी, नेहरू हों या इंदिरा, बहुत लंबी प्रक्रिया और बहुत कामों और उपलब्धियों की बहुत जटिल प्रक्रिया के बाद जाकर जननेता बने - सही या गलत। मोदी जी छह माह के भीतर भाजपा के सारे वरिष्ठों को सरकाते हुए जितने बड़े आभामंडल के अधिकारी बन गए, उस आभामंडल का स्रोत क्या है, उसकी कीमत क्या है?
और उसकी कीमत है -- ठीक करेंसी में वह कीमत है, जो उन पर निवेश की गई, और जिसका वसूला जाना व्यापार का जायज तर्क है।
मध्यवर्ग के बेचारे पस्त जन अपने आदर्शों, नैतिकताओं और आचार-विचार के खातों में ही सब कुछ नापने के अभ्यस्त होते हैं।
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