Monday, 5 December 2016

नौकरी या रिश्तों में दबाव महसूस कर रहे हैं तो यह कहानी जरूर पढ़ें...


अगर मेंढक को गर्म उबलते पानी में डाल दें तो वह छलांग लगा कर बाहर आ जाता है लेकिन यदि उसी मेंढक को सामान्य तापमान के पानी में रखें और धीरे धीरे उस पानी को गर्म करते जाएं तो थोड़ी देर बाद वह मर जाता है।
 क्या आपको पता है ऐसा क्यों होता है? 
नहीं ना, तो हम बताते हैं। इस कहानी का मेंढक मरने से पहले आपको बहुत कुछ सिखा जाएगा।
दरअसल होता यह है कि जैसे जैसे पानी का तापमान बढ़ता है, मेंढक उस तापमान के हिसाब से अपने शरीर को एडजस्ट करने लगता है। पानी का तापमान खौलने तक वह ऐसा ही करता रहता है। अपनी पूरी उर्जा वो पानी के तापमान से तालमेल बनाने में खर्च करता है। लेकिन जब पानी खौलने को होता है तब मेंढक अपने शरीर को उसके अनुसार समायोजित नहीं कर पाता। अब वो पानी से बाहर आने के लिए, छलांग लगाने की कोशिश करता है लेकिन अब ये मुमकिन नहीं है। क्योंकि सारी ऊर्जा उसने पानी के साथ एडजस्ट होने में खर्च कर दी। अब छलांग लगाने की शक्ति उसमें बची ही नहीं। अब वो पानी से बाहर नहीं आ पाता है और वहीं मर जाता है।
अब सवाल यह है कि मेंढक को किसने मारा?
दरअसल मेंढक को मारा सही वक्त पर फैसला न लेने की उसकी अयोग्यता ने। वह यह तय नहीं कर सका कि उसे कब पानी से बाहर छलांग लगाना थी।
सीख
यही गलती हम भी करते हैं। हम अपने वातावरण और लोगों के साथ सामंजस्य बनाए रखने की तब तक कोशिश करते हैं, जब तक छलांग लगाने कि हमारी सारी ताकत खत्म नहीं हो जाती। लोग हमारे इस तालमेल बनाए रखने की काबिलियत को कमजोरी समझते हैं। इसे हमारी आदत और स्वभाव समझते हैं। उन्हें भरोसा होता है कि वो कुछ भी करें, हम तो मेंढक की तरह एडजस्ट कर ही लेंगे और वो तापमान बढ़ाते जाते हैं। हकीकत यही है कि नौकरी हो रिश्ते हों या फिर समाज। हमारा शोषण करने वाले लोगों के बीच हम खुद को एडजस्ट करते जाते हैं।

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